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स्वास्थ्य रक्षक सखा-Health Care Friend

Tuesday, 23 April 2013

प्रार्थना भी भय का विस्तार....! अप्रेल-II, 2013

बुराई : बुराई छोटी-बड़ी नहीं होती। और ध्यान रहे, बुराई एक, दो और तीन भी नहीं होती। एक बुराई काफी है। सब बुराईयां उसके पीछे आ जाती हैं। एक से दरवाजा खुल गया कि पूरी भीड़ आ जाती है।-ओशो

प्रेम : अगर प्रेम में उतर गये, तो प्रेम की समझ तो आ जाऐगी, लेकिन अध्ययन नहीं हो सकेगा। अध्ययन के लिये दूरी चाहिये और तटस्थता चाहिये और फासला चाहिये। प्रेम के लिये दूरी मिटनी चाहिये, सब फासले गिरने चाहिये। तब प्रेम की समझ का तो उदय होगा, लेकिन उस समझ को हम अध्ययन नहीं कह सकते।-ओशो

क्रान्ति : तथ्य क्रान्ति ले आते हैं। सत्य स्वयं क्रान्ति है। जैसे ही सत्य दिखाई पड़ता है, स्वयं ही क्रान्ति हो जाती है।-ओशो

सरलता : तेईस घण्टे तुम बेईमान हो, झूठ बोल रहे हो, चोरी कर रहे हो, धोखा दे रहे हो और एक घण्टे के लिये तुम एकदम सरल हो गये। सरलता कोई खेल है? कि तुमने जब चाहा, तब सम्हाल लिया। यह असम्भव है।-ओशो

अहंकार : सिकुड़ा हुआ आदमी अहंकार से भर जाऐगा, फैला हुआ आदमी मिटता है। तुम जितने फैल जाओगे, अहंकार उतना ही कम हो जाएगा। तुम जितने सिकुड़ जाओगे, अहंकार उतना ही ज्यादा हो जायेगा। अहंकार एक तरह का संकुचन है। ब्रह्म- अनुभव एक तरह का विस्तार है।-ओशो

नींद : ईश्‍वर को जानने चलेंगे तो नींद टूटेगी और नींद में हमारा बड़ा स्वार्थ है, क्योंकि हमने अब तक जन्मों-जन्मों तक नींद को हीं संवारा है, वही हमारी निर्मिति है।-ओशो

जीवन : जीवन को जानने की कुंजी वर्तमान में जीना है। जो उपस्थित है, उसमें समग्र रूपेण चेतना को उपस्थित कर देना है।-ओशा

मौत : जिन्दगी भर हम मौत से अपने को छिपाए रखते हैं। झूठी है यह बात। मौत को जानना और पहचानना है।-ओशो

अहंकारी : सौ में से निन्यानबे-धर्म की खोज में गए लोग अहंकारी होते हैं। इसलिये धार्मिक व्यक्तियों में विनम्रता पानी बहुत कठिन है। धार्मिक आजादी अक्सर अहंकारी होगा, बल्कि भयंकर अहंकारी होगा।-ओशो

सुख-दुख : तर्क सीधा है-आप अपने लिये सुख चाहते हैं, दूसरे के लिये दुख चाहते हैं। अगर दूसरे को दुख देकर भी खुद को सुख मिले, तो आप सुख चाहते हैं। सारी दुनिया को दुख मिले, तो कोई चिन्ता नहीं, आपको सुख मिलना चाहिये। सबको दुख मिले तो भी चलेगा। यही तो असाधु का भाव है।-ओशो

मापदण्ड : हम तोलते हैं आदमी को, क्या है उसके पास, कितनी शिक्षा, कितना पद, कितनी बड़ी कुर्सी, सिंहासन। क्या है तुम्हारे पास, वही तुम हो-यह हमारा मापदण्ड है।-ओशो

मित्र-शत्रु : जब तक राम को कोई शरण की तरह अनुभव न कर ले, तब तक इस जगत में सभी शत्रु हैं, मित्र कोई भी नहीं।-ओशो

भय : आंख बन्द करके कभी देखें तो आप पाएंगे, सिवाय भय के और भीतर कुछ भी नहीं। इस भय के कारण आप भगवान की प्रार्थना भी कर सकते हैं, लेकिन वह प्रार्थना भी भय का विस्तार ही होगा।-ओशो

 सपने : हम सपने में जीते हैं, जहां है वहां नहीं जीते, जहां नहीं हैं, वहां जीते हैं।-ओशो

शब्द-नि:शब्द : धर्म के आयाम में शब्द से अर्थ का उदय नहीं होता। नि:शब्द से अर्थ का उदय होता है। शब्दों को हटाएं, तो नि:शब्द की धारा प्रगट होगी।-ओशो

धर्म : धर्म है जागरण का प्रयास। धर्म है पूरी तरह चेतना को एक्सपेंशन, चेतना को और विस्तार देना।-ओशो

स्त्रोत :  प्रेसपालिका (पाक्षिक) जयपुर, राजस्थान, से साभार!

Saturday, 6 April 2013

सिर्फ ध्यान स्वतंत्र बनाता है। अप्रेल-I, 2013

ध्यान का अर्थ है, इस क्षण में होना, इस क्षण के पार न जाना।-ओशो

सिवाय ध्यान के मृत्यु को कोई और चीज पार नहीं करती है। ज्ञान नहीं, ध्यान ही केवल मृत्यु में भी साथी हो सकता है। सिर्फ ध्यान स्वतंत्र बनाता है।-ओशो

एक भिखमंगा भी त्यागी हो सकता है। क्योंकि त्याग का कोई सम्बन्ध, कितना छोड़ा है, इससे नहीं, बल्कि छोड़ने के भाव से है।-ओशो

Friday, 15 March 2013

हंसती हुई मनुष्यता-ओशो वाणी : मार्च-II, 2013

जो हमारे पास है वह हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है। जो हमारे पास नहीं है, उसका हम हिसाब लगाये बैठे हैं। और जो हमारे पास है, वह इतना है कि जो हमारे पास नहीं है, उसका हिसाब लगाना ही नासमझी है, उसका कोई मूल्य ही नहीं है। कठिनाई यह है कि जो मिला हुआ है-वह टेकन फॉर ग्रांटेड हो जाता है। वह है ही, उसकी कोई बात ही नहीं करनी है, हमें। हमारा दावा है कि हमें यह मिलना चाहिये। अगर मेरी आंखें कल चली जायें तो मैं किससे शिकायत करूंगा? और जब तक मेरे पास आंख थी, तब तक मैंने कुछ भी नहीं किया उन आंखों से-न मैंने फूल देखे, न मैंने चांदनी देखी, न मैंने कोई सुंदर चेहरा देखा-मैंने इन आंखों से कुछ भी नहीं किया। लेकिन अब आंखों के लिये रो रहा हूँ।-ओशो

मृत्यु में बड़ी सुरक्षा है: जीवन के पास होना खतरनाक है, क्योंकि जीवन है-असुरक्षा। मृत्यु में बड़ी सुरक्षा है। एक बार मर गये सो मर गये, फिर न कोई बीमारी लगती, फिर न कोई दुबारा मृत्यु हो सकती, न दिवाला निकलता, न चोरी होती, न डाका पड़ता। फिर तो विश्राम करो कब्र में, विश्राम ही विश्राम है।-ओशो

मैं धन विरोधी नहीं हूँ। न धन विरोधी हूँ, न ध्यान विरोधी हूँ। मैं मानता हूँ कि ध्यानी के हाथ में धन हो तो धन भी अभूतपूर्व रूप से उपयोगी हो जाता है और धनी के हाथ में ध्यान लगे, तो ध्यान भी सुगमता से सधता है।-ओशो

दांव : सब कुछ दांव पर लगाना बड़ी हिम्मत की बात है, दस्साहस की बात है। सब कुछ दांव पर लगाने का अर्थ है: पीछे लौटने की सीढी ही तोड़ दी, सेतु ही गिरा दिया। ‘हॉं’ जो कही तो उसमें कहीं भी कोई ‘नहीं’ की गुजाइश न रखी। फिर गर्दन कटे तो कटे, जीवन रहे तो रहे, न रहे तो न रहे।-ओशो

लाभ ही लाभ : पश्‍चिम समर्थ है स्वर्ग बसाने में और पूरब के पास ध्यान का विज्ञान है। दोनों का लेन-देन हो सकता है। इस सौदे में किसी का नुकसान नहीं होगा, दोनों लाभ ही लाभ में रहेंगे।-ओशो

उत्सव : हर घड़ी उत्सव उचित है, क्योंकि जब तुम उत्सव में हो, तभी तुम परमात्मा के निकट हो और जब तुम उत्सव में नहीं हो, तुम परमात्मा के बाहर हो, उत्सव में होना परमात्मा में होना है, उत्सव में न होना परमात्मा से बाहर होना है। तुम्हारी मर्जी! तुम्हें अगर परमात्मा से बाहर-बाहर जीना हो, तो जियो। फिर संताप, विषाद होगा, पीड़ा, चिंता होगी, चुनाव तुम्हारा है। जो ऊर्जा उत्सव बन सकती थी, वही चिंता और विषाद बनेगी।-ओशो

हंसती हुई मनुष्यता : हंसते हुए इंसान से और हंसते हुए क्षणों में पाप करना असंभव है। सारे पापों के पीछे उदासी, दुख, अंधेरा, बोझ, भारीपन, क्रोध, घृणा-ये सब है। अगर हम हंसती हुई मनुष्यता को पैदा कर सकें तो दुनिया के नब्बे प्रतिशत पाप तत्कक्षण गिर जायेंगे। जिन लोगों ने पृथ्वी को उदास किया है, उन लोगों न पृथ्वी को पापों से भर दिया है।-ओशो

ऐसे हंसो कि तुम्हारा पूरा जीवन एक हंसी बन जाये। इस भांति जियो कि पूरा जीवन एक मुस्कुराहट बन जाये। इस भांति जियो कि आसपास के लोगों की जिंदगी में मुस्कुराहट फैल जाये। इस भांति जियो कि सारी जिंदगी एक हंसी के खिलते हुए फूलों की कतार हो जाये।-ओशो

Sunday, 10 March 2013

मृत्यु सुविधापूर्ण है-ओशो वाणी : मार्च-I, 2013

दुख हमारा चुनाव है : जिंदगी बहुत मौके दे रही है, हम सब मौके चूक जाते हैं और हर चीज में हमने तरकीबें बना रखी हैं। अगर मुझे एक सुंदर चेहरा दिखाई पड़ा तो उस सुंदर चेहरे से मुझे जो सुख मिल सकता था, वह मैं नहीं लूंगा; उससे दुख ले लूंगा-कि वह किसी और की पत्नी है, किसी और का पति है, वह किसी और का बेटा है। तो मैं चूक गया और वह जिसका बेटा है, जिसकी पत्नी है, जिसका पति है, वह किसी और का चेहरा देख कर दुखी हुआ जा रहा है। वह अलग दुखी हो रहा है, हम अलग दुखी हो रहे हैं। सारी दुनिया दुखी हो रही है। दुख हमारा चुनाव है। तुम दुख चुन रहे हो तो दुख इकट्ठा होता चला जाता है और फिर दब जाओगे उसके नीचे, फिर परेशान हो जाओगे। दुख को चुनो मत। कौन तुमसे कहता है, दुख को चुनो? सुख को चुनो।-ओशो


दुनिया में तमाशबीनी बढती चली गई। इतनी बढ गई है कि अब हर चीज में तमाशबीनी है। तुम प्रेम नहीं करते, जब प्रेम वगैरह का खयाल उठता है, फिल्म देख आये। अरे अब दूसरे पेशेवर प्रेम करने वाले मौजूद है, जो तुमसे अच्छे ढंग से कर सकते हैं, क्या-क्या लहजे से करते हैं, तो तुम काहे को मेहनत करो अलग से! फिल्म ही देख आये, मामला खत्म हो गया।-ओशो

यह जीवन एक-एक क्षण बहुमूल्य है, क्योंकि इस एक-एक क्षण में तुम्हारे जीवन में क्रान्ति घट सकती है, तुम्हारे भीतर बुद्धत्व का अवतरण हो सकता है। तुम्हारे भीतर वही फूल खिल सकते हैं, जो बुद्ध की चेतना में खिले। वही बांसुरी तुमसे बज सकती है, जो कृष्ण के ओठों पर बजी।-ओशो

भय और प्रेम बड़ी विपरीत अवस्थाएँ हैं। भय में आदमी सिकुड़ता है, संकुचित होता है, छोटा होता है। प्रेम में फैलता है, विस्तीर्ण होता है।-ओशो

पिछले जन्मों के कर्मों के फल : लोग भी अजीब हैं, पिछले जन्मों की तो बातें करते हैं कि पिछले जन्मों के कर्मों के फल मिल रहे हैं और इसी जन्म में जो उपद्रव करते रहते हैं, उनका गणित बिठाते नहीं! पिछला जन्म था कि नहीं, यह भी तुम्हें पता नहीं है। मगर यह जन्म तो साफ है। इसी जन्म के हिसाब जरा देखो।-ओशो

जीवन का खजाना अकूत है, उसकी गहराई अथाह है, उसकी गहराई अथाह है। अगर कहीं कोई ईश्‍वर है तो वह जीवन में व्याप्त है, रोएं-रोएं में, कण-कण में, वही प्रतिध्वनित है। बाहर वह, भीतर वह। दशों दिशाओं में वही है।-ओशो

जीवन और मृत्यु : जीवन ही खतरनाक है। मृत्यु सुविधापूर्ण है। मृत्यु से ज्यादा आरामदायक और कुछ भी नहीं है। इसलिये लोग मृत्यु को वरण करते हैं, मृत्यु जीवन का निषेध है। लोग ऐसे जीते हैं, जिसमें कम से कम जीना पड़े, न्यूनतम-क्योंकि जितने कम जियेंगे उतना कम खतरा है, जितने ज्यादा जियेंगे उतना ज्यादा खतरा है। जितनी त्वरा होगी जीवन में उतनी ही आग होगी, उतनी ही तलवार में धार होगी।-ओशो

Wednesday, 6 February 2013

ओशो विचार-ओशो वाणी : फरवरी, 2013

1. अगर जीतना हो मन को तो पहला नियम यह है कि लड़ना मत।

2. हम एक वृक्ष के पास खड़े हैं। उसमें कांटे लगे हैं और फूल लगा है तो लगा है। हम न तो यह कहते कि फूल अच्छा है, न यह कहते हैं कि कांटे बुरे हैं। 

3. साक्षी होना कोई कर्म नहीं, कृत्य नहीं और वह साक्षी हो जाना ध्यान है। साक्षी हो जाना ध्यान है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है।

4. घड़ी, दो घड़ी के लिये अपने को पूरा छोड़ो और जो हो रहा है, उसे पूरा स्वीकार कर लो। फिर कुछ होगा। वह कुछ होना ध्यान है।

5-जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी गुणों (दुर्गुणों से सम्पन्न) सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं। वे दूसरे लोगों और समाज पर हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं। ऐसे लोग राजनेता बन जाते हैं या वे पुरोहित बन जाते हैं और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरों को भी नहीं करने दे सकते। इसलिए वे दूसरे लोगों की हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं।

6-सफल होता है आदमी, तो मौत बहुत दूर मालूम पड़ती है। असफल होता है आदमी, तो खयाल आने लगते हैं उदासी के, मरने का भाव होने लगता है।

7-हमारे सभी दु:खों के पीछे मृत्यु छिपी है। अगर आप खोज करेंगे, तो आप जिन बातों को भी दुख मानते हैं, उन सबके पीछे मृत्यु की छाया मिलगी।
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1-इस दुनिया में सच कहना दुश्मन बनाना है। इस दुनिया में किसी से भी सच कहना दुश्मन बनाना है। झूठ बड़ी मित्रताएं स्थापित करता है। कभी एक दफा देखें, चौबीस घण्टे तय कर लें कि सच ही बोलेंगे! आप पाएंगे सब मित्र विदा हो गए| चौबीस घंटा, इससे ज्यादा नहीं। पत्नी अपना सामान बांध रही है, लड़के-बच्चे कह रहे हैं : नमस्कार। मित्र कह रहे हैं कि तुम ऐसे आदमी थे! सारा जगत शत्रु हो जायेगा।-ओशो

2-ध्यान रहे, दुनिया में कोई आदमी आपको सन्देह में नहीं डाल सकता। सन्देह में डाल ही तब सकता है, जब सन्देह आपके भीतर भरा हो।-ओशो

3-अंधे लोग लड़ते हैं, उद्विग्न हो जाते हैं। वे आपका सिर तोड़ने को राजी हो जायेंगे, लेकिन आपकी बात सुनने को राजी नहीं होंगे।-ओशो

4-दर्शनशास्त्र खुजली की तरह है। खुजाने का मन होता है, इसकी बिना फिक्र किये कि परिणाम क्या होगा। खुजाते वक्त अचछा भी लगता है, लेकिन फिर लहू निकल आता है और पीड़ा होती है।-ओशो

5-प्रेम तो कला है, स्वयं को रूपान्तरित करने की। अगर एक को प्रेम किया, तो आप एक हो जायेंगे और या फिर अनंत को प्रेम करें, तो आप अनंत हो जायेंगे।-ओशो

6-सुख के क्षण में सुख क्षणभंगुर है, तत्क्षण दिखाई पड़ जाता है। सुख के क्षण में सुख जा चुका, यह अनुभव में आ जाता है। सुख के क्षण में दुख मौजूद हो जाता है।-ओशो

7-जीवन वही हो जाता है, जिस भाव को लेकर हम जीवन में प्रविष्ट होते हैं। जीवन वही हो जाता है, जो हम उसे बनाने को आतुर, उत्सुक और प्यासे होते हैं। जीवन मिलता नहीं, निर्मित करना होता है। जीवन बना-बनाया उपलब्ध नहीं होता, सर्जन करना होता है। जन्म के साथ मिलता है-अवसर, जीवन नहीं।-ओशो

8-मेरी मौलिक दृष्टि जगत को प्रेम से भरने की है। प्रेम मेरे लिये धर्म है। सार रूप में, निचोड़ रूप में धर्म-प्रेम है।-ओशो

9-धार्मिक व्यक्ति भय से प्रभावित नहीं होता, न लोभ से आन्दोलित होता है, क्योंकि धार्मिक व्यक्ति तो सत्य की तलाश में होता है।-ओशो

स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.02.13 & 16.02.13 के अंक से साभार!

Friday, 4 January 2013

खुशी के खिलाफ समाज के ठेकेदार! ओशो वाणी : जनवरी, 2013

खुशी के खिलाफ : जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं| वे हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं| वे राजनेता बन जाते हैं| वे पुरोहित बन जाते हैं| और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरो को भी नहीं करने दे सकते| इसलिए वे हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं| जरा इसके पीछे का कारण देखो| अगर वह खुद जिंदगी का मजा नहीं ले सकता तो वह कम से कम तुम्हारे मजे में जहर तो घोल ही सकता है| इसीलिए सभी तरह के विकलांग एक जगह जमा होकर अपनी बुद्धि लगाते हैं, ताकि जोरदार नैतिकता का ढॉंचा खड़ा कर सकें और फिर उसके आधार पर हर चीज की भर्त्सना कर सकें|-ओशो
समाज के ठेकेदार : जो नैतिकतावादी, समाज के ठेकेदार हैं; उन्हीं का दुनिया को विषाक्त बनाने में सबसे बड़ा हाथ है| और ये लोग हर जगह हैं| ऐसे लोग ही ज्यादातर शिक्षक, शिक्षाविद, प्रोफेसर, कुलपति, संत, बिशप, पोप वगैरह बनते हैं; वे ऐसे बनना चाहते हैं, ताकि वे दूसरों की निंदा कर सकें| यहां तक कि वे इसके लिये सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं| अगर उन्हें दूसरों की निंदा करने का सुख मिले| वे हर कहीं हैं, कई परदों के पीछे छुपे हुए| और वे हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए काम करते हैं, सिर्फ तुम्हारी भलाई के लिए, इसलिए तुम उनके आगे रक्षाहीन हो| उनकी विरासत वास्तविक और बड़ी है| पूरे इतिहास पर उनका प्रभुत्व रहा है|-ओशो

अस्वस्थ व्यक्ति मजा ले ही नहीं सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है| जो गीत गा सकता है, जो नाच सकता है, वह नाचेगा और गाएगा, वह सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा| लेकिन जो नाच नहीं सकता, जो विकलांग है, जिसे लकवा मार गया है, वह कोने में पड़ा रहेगा और योजनाएँ बनाएगा कि दूसरों पर कैसे हावी हुआ जाए| वह कुटिल बन जाएगा| जो रचनाशील है, वह रचेगा| जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है|
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काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाता है : जब व्यक्ति कामवासना से थक जाता है तो तुरंत भीतर चंद्र ऊर्जा सक्रिय हो जाती है। जब सूर्य छिप जाता है तब चंद्र का उदय होता है। इसीलिए तो काम-क्रीड़ा के तुरंत बाद व्यक्ति को नींद आने लगती है। सूर्य ऊर्जा का काम समाप्त हो चुका, अब चंद्र ऊर्जा का कार्य प्रारंभ होता है। भीतर की सूर्य ऊर्जा काम-केंद्र है। उस सूर्य ऊर्जा पर संयम केंद्रित करने से, व्यक्ति भीतर के संपूर्ण सौर-तंत्र को जान ले सकता है। काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाता है। काम-केंद्र के सभी रहस्यों को जान सकता है। लेकिन बाहर के सूर्य के साथ उसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है।-आचार्य रजनीश ओशो

युक्तियुक्त मनुष्य और तर्कसंगत मनुष्य के बीच अंतर जानना बड़ा जरूरी है। एक युक्तियुक्त मनुष्य कभी सिर्फ तर्कसंगत नहीं होता, क्योंकि एक युक्तियुक्त मनुष्य अपने अनुभव से जानता है कि तर्कसंगत और तर्कहीनता दोनों ही जीवन के पहलू हैं; कि जीवन में तर्क और भावनाएं, मस्तिष्क और हृदय दोनों होते हैं।-आचार्य रजनीश ओशो

अंधों ने और अंधों के शोषकों ने मिलकर जो षड़यंत्र किया है, उसने करीब-करीब धर्म की जड़ काट डाली है| धर्म की साख है और अधर्म का व्यापार है|-आचार्य रजनीश ओशो

स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.01.13 & 16.01.13 के अंक से साभार!

Friday, 7 December 2012

स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजने में पृथ्वी पर रास्ते बनाना भूल गए हैं| ओशो वाणी : दिसम्बर, 2012

जिसको तुम प्रेम करते हो, जिसकी जरा-जरा सी बात की तुम चिन्ता-फिकर करते हो, कि उसके पैर में मोच न आ जाए, इसकी फिकर लेते हो, तुम उसी को गोली मार सकते हो! अगर उसका व्यवहार तुम्हारे अहंकार के विपरीत हो ताए तो उसको जहर पिला सकते हो! उसी को तुम पहाड़ से ढकेल सकते हो! ऐसा तुम्हारा प्रेम, प्रेम नहीं हैं| जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है! प्रेम यदि सच में ही प्रेम है, तो वह घृणा कैसे बन सकता है?-आचार्य रजनीश ओशो|

ऐसे तो सभी मरते हैं, लेकिन धन्यभागी है वह, जो बोधपूर्वक मरता है, जो प्रेस से मरता है| देह तो मरेगी ही; लेकिन जो अहंकार को मर जाने देता है, उससे बड़ा सौभाग्यशाली व्यक्ति इस पृथ्वी पर दूसरा नहीं|-ओशो

आदर्शों के वस्त्रों में हम छिपा तो सकते हैं, लेकिन मिटा नहीं सकते| छिपाना मिटाने का उपाय नहीं है|-ओशा

जो हम नहीं हैं, वह हम अपने को मानते हैं और जो हम हैं, वह हम अपने को जानना भी नहीं चाहते हैं, मानने की बात दूर| हम उस तरफ आँख भी नहीं उठाना चाहते हैं|-ओशो

प्रेम किसी को नहीं जानता! : प्रेम न तो जाति को जानता है, न कुल को जानता है, न कुलीनता को जानता है, न धन को जानता| प्रेम का धन से क्या सम्बन्ध है? प्रेम न रंग को जानता है| हड्डी-मांस-मज्जा से प्रेम का सम्बन्ध क्या है? तुम हिन्दू हो कि मुसलमान कि जैन कि ईसाई, प्रेम का लेना-देना क्या है?-आचार्य रजनीश ओशो

आदमी पशु है! हम एक-एक आदमी को समझा रहे हैं कि तुम स्वयं परमात्मा हो| सच्चाई यह है कि हर आदमी परमात्मा नहीं है, सिर्फ पशु है| आदमी पशु है, यह तथ्य है, आदमी परमात्मा हो सकता है, यह संभावना है| लेकिन हम समझा रहे हैं आदमी परमात्मा है| साधु-सन्यासियों के पास पापी बैठकर सिर हिला रहे हैं और कहते हैं, धन्य महाराज, बहुत ठीक आप कह रहे हैं| क्योंकि वे साधु सन्यासी समझाते क्या हैं? वे समझाते हैं, तुम परमात्मा हो! तुम्हारे भीतर स्वयं सच्चिदानंद ब्रह्म का निवास है, तुम वही हो| और पापी बड़ा प्रसन्न होता है| अपने को भूलने में सुविधा मिल जाती है| वह जो है, उससे बचने का रास्ता मिल जाता है| सपने में वह ब्रह्म हो जाता है और वस्तुत: वह पशु बना रहता है और उसके पशु होने और ब्रह्म होने में एक दीवार खड़ी हो जाती है| होता है पशु, उसे छिपा लेता है| जो नहीं होता, उसका अभिनय करने लगता है| और इस तरह भारत का पूरा व्यक्तित्व स्प्लिट पर्सनैलिटी है, पूरा व्यक्तित्व खंड-खंड हो गया| दो बड़े खंडों में टूट गया-जो हम नहीं हैं, वह हम अपने को मानते हैं और जो हम हैं, वह हम अपने को जानना भी नहीं चाहते हैं, मानने की तो बात ही दूर है| हम उस तरफ आंख भी नहीं उठाना चाहते हैं| बड़ी तरकीब है यह| आदमी पशु है, यह भारत में आज तक स्वीकृत नहीं हो सका| और आदमी पशु है| पशुओं की बड़ी जमात का ही एक हिस्सा है| और जब तक हम आदमी की इस पशुता के तथ्य को, यह रियलिटी है, यथार्थ है, इसको स्वीकार नहीं करते, तब तक इसके रूपान्तरण को भी कोई मार्ग नहीं मिल सकता है|-आचार्य ओशो|

विश्रांत व्यक्ति भयभीत नहीं हो सकता है| तुम एक विश्रांत व्यक्ति को भयभीत नहीं कर सकते| यदि भय आता भी है, वह लहर की तरह आता है...वह जड़ें नहीं जमाएगा|

भय लहरों की तरह आता है और जाता है और तुम उससे अछूते बनते रहते हो, यह सुंदर है| जब वह तुम्हारे भीतर जड़ें जमा लेता है और तुम्हारे भीतर विकसित होने लगता है, तब यह फोड़ा बन जाता है, कैंसर का फोड़ा| तब वह तुम्हारे अंतस की बनावट को अपाहिज कर देता है|

तो जब कभी तुम आतंकित महसूस करो, एक चीज देखने की होती है कि शरीर तनावग्रस्त नहीं होना चाहिए| जमीन पर लेट जाओ और विश्रांत होओ, विश्रांत होना भय की विनाशक औषधि है; और वह आएगा और चला जाएगा| तुम बस देखते हो|

देखने में पसंद या नापंसद नहीं होनी चाहिए| तुम बस स्वीकारते हो कि यह ठीक है| दिन गरम है; तुम क्या कर सकते हो? शरीर से पसीना छूट रहा है...तुम्हें इससे गुजरना है| शाम करीब आ रही है, और शीतल हवाएं बहनी शुरू हो जाएंगी...इसलिए बस देखो और विश्रांत होओ|-आचार्य आशो

हिंदुस्तान ने पॉंच हजार सालों से जमीन पर चलने लायक रास्ता नहीं बनाया, स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजे हैं| स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजने में पृथ्वी पर रास्ते बनाना भूल गए हैं| हमारी आँखें आकाश की तरफ अटक गयी हैं| और हमारे पैर तो मजबूरी से पृथ्वी पर ही चलेंगे| बीसवीं सदी में आकर हमको अचानक पता चला है कि हमारी आँखों और पैरों में विरोध हो गया है| आँखें आकाश से वापस जमीन की तरफ लौटी हैं तो हम देखते हैं, नीचे कोई रास्ता नहीं है| नीचे हमने कभी देखा नहीं|-आचार्य रजनीश ओशो|

ज्योतिषी : मैंन सुना है कि यूनान में एक बहुत बड़ा ज्योतिषी एक रात एक गढ्ढे  में गिर गया| जोर से चिल्लाया तो बड़ी मुश्किल से पास की किसी किसान औरत ने उसे निकाला| जब उसे निकाला, तो उस ज्योतिषी ने कहा है कि मॉं, बहुत धन्यवाद| मैं एक बहुत बड़ा ज्योतिषी हूँ, तारों के संबंध में मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता| अगर तुझे तारों के संबंध में कुछ जानना हो तो मैं बिना फीस के तुझे बता दूँगा| मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है| उस बूढ़ी औरत ने कहा, बेटे तुम निश्चिंत रहो, मैं कभी न आऊँगी, क्योंकि जिसे अभी जमीन के गढ्ढे नहीं दिखायी पड़ते हैं, उसके आकाश के तारों के ज्ञान का भरोसा मैं कैसे करूँ?-आचार्य ओशो

स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.12.12 & 16.12.12 के अंक से साभार!

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