अज्ञान भोग है। ज्ञान त्याग है। त्याग क्रिया नहीं है। वह करना नहीं होता है। वह हो जाता है। वह ज्ञान का सहज परिणाम है। भोग भी यांत्रिक है। वह भी कोई करता नहीं है। वह अज्ञान की सहज परिणति है। फिर, त्याग के कठिन और कठोर होने की बात ही व्यर्थ है। एक तो वह क्रिया ही नहीं है। क्रियाएं ही कठिन और कठोर हो सकती हैं। वह तो परिणाम है। फिर उससे जो छूटता मालूम होता है, वह निर्मूल्य और जो पाया जाता है, वह अमूल्य होता है।-ओशो
जीवन से सम्बंधित हर एक प्रिय और अप्रिय विषय पर महान योगी आचार्य रजनीश ओशो के अमूल्य, बेबाक और मार्गदर्शक विचारों का संकलन!
Labels
- अज्ञान
- अधर्म
- अवसाद
- अस्वस्थ
- अहंकार
- आत्मा
- आत्मीयता
- आदर्शवाद
- आनन्द
- आंसू
- ईर्ष्या
- उत्सव
- उदासी
- ओशो
- ओशो वाणी
- कांटे
- काम
- कामुक
- कुरूप
- क्रान्ति
- क्रोध
- क्षण
- खुशी
- गुलाम
- घृणा
- चालाक
- जन्म
- जहर
- जागृति
- जिंदगी
- जीवन
- ज्ञान
- ज्योतिषी
- ठेकेदार
- डॉ. निरंकुश
- डॉ. मीणा
- त्याग
- दमन
- दांव
- दुख
- देह
- धन
- धर्म
- धार्मिक
- ध्यान
- नकारात्मक
- नफरत
- नमस्कार
- नींद
- पति
- पत्नी
- परमात्मा
- पशु
- पुरोहित
- प्यार
- प्रार्थना
- प्रेम
- प्रेस
- प्रेसपालिका
- फूल
- बुद्धत्व
- बुराई
- भगवत्ता
- भगवान
- भय
- भोग
- भोजन
- मनुष्य
- मूर्च्छा
- मृत्यु
- मौत
- राजनेता
- लड़ना
- विज्ञान
- विध्वंस
- वृक्ष
- सत्य
- सपने
- सफल
- समाज
- समाधि
- सरल
- साक्षी
- सुख
- सुन्दर
- सृजन
- सेक्स
- स्त्री
- स्मृति
- स्वतंत्र
- स्वीकार
- हंसी
- हृदय
स्वास्थ्य रक्षक सखा-Health Care Friend
Tuesday, 25 February 2014
Tuesday, 4 February 2014
क्रोध और काम को कैसे जीते?
सम्यक-जागरण ही जीवन विजय
दोपहर तप गई है। पलाश के वृक्षों पर फूल अंगारों की तरह चमक रहे हैं। एक सुनसान रास्ते से गुजरता हूँ। बांसों का झुरमुट है और उनकी छाया भली लगती है। कोई परिचित चिड़िया गीत गाती है। उसके निमंत्रण को मान वहीं रुक जाता हूँ। एक व्यक्ति साथ है। पूछ रहे हैं, 'क्रोध को कैसे जीतें, काम को कैसे जीते?’ यह बात तो अब रोज-रोज पूछी जाती है। इसके पूछने में ही भूल है, यही उनसे कहता हूँ। समस्या जीतने की है ही नहीं। समस्या मात्र जानने की है। हम न क्रोध को जानते हैं और न काम को जानते हैं। यह अज्ञान ही हमारी पराजय है। जानना जीतना हो जाता है। क्रोध होता है, काम होता है, तब हम नहीं होते हैं। होश नहीं होता है, इसलिए हम नहीं होते हैं। इस मूर्च्छा में जो होता है, वह बिलकुल यांत्रिक है। मूर्च्छा टूटते ही पछतावा आता है, पर वह व्यर्थ है; क्योंकि जो पछता रहा है, वह काम के पकड़ते ही पुन: सो जाने को है। वह न सो पाए-अमूर्च्छा बनी रहे, जागृति, सम्यक-स्मृति बनी रहे, तो पाया जाता है कि न क्रोध है, न काम है। यांत्रिकता टूट जाती है और फिर किसी को जीतना नहीं पड़ता है। दुश्मन पाये ही नहीं जाते हैं। एक प्रतीक कथा से समझे। अंधेरे में कोई रस्सी सॉंप दिखती है। कुछ उसे देखकर भागते हैं, कुछ लड़ने की तैयारी करते हैं। दोनों ही भूल में हैं, क्योंकि दोनों ही उसे स्वीकार कर लेते हैं। कोई निकट जाता है और पाता है कि सॉंप है ही नहीं। उसे कुछ करना नहीं होता, केवल निकट भर जाना होता है। मनुष्य को अपने निकट भर जाना है। मनुष्य में जो भी है, सबसे उसे परिचित होना है। किसी से लड़ना नहीं है और मैं कहता हूँ कि बिना लड़े ही विजय घर आ जाती है। स्व-चित्त के प्रतीक सम्यक-जागरण ही जीवन विजय का सूत्र है। स्रोत : ओशो साहित्य।
Saturday, 19 October 2013
सृजन कठिन है, विध्वंस आसान
भगवान नहीं-भगवत्ता : भगवान पर जोर नहीं देता हूं, भगवत्ता पर जोर देता हूं। भगवत्ता का अर्थ हुआ, नहीं कोई पूजा करनी है, नहीं कोई प्रार्थना, नहीं किन्हीं मंदिरों में घड़ियाल बजाने है, न पूजा के थाल सजाने है, न अर्चना, न विधि-विधान, यज्ञ-हवन, वरन अपने भीतर वह जो जीवन की सतत धारा है। उस धारा का अनुभव करना है, वह जो चेतना है, चैतन्य है। वह जो प्रकाश है स्वयं के भीतर, जो बोध की छिपी हुई दुनियां है, वह जो बोध का रहस्यमय संसार है, उसका साक्षात्कार करना है, उसके साक्षात्कार से जीवन सुगंध से भर जाता है। ऐसी सुगंध से जो फिर कभी चुकती नहीं। उस सुगंध का नाम भगवत्ता है। परम रस का अनुवभ-ओशो।
सत्य के मार्ग पर: ध्यान रहे असत्य के मार्ग पर, सफलता मिल जाए तो व्यर्थ है, असफलता भी मिले तो सार्थक है। सवाल मंजिल का नहीं, सवाल कहीं पहुंचने का नहीं, कुछ पाने का नहीं, दिशा का नहीं, आयाम का नहीं। कंकड़-पत्थर इकट्ठे भी कर लिए किसी ने, तो क्या पाया। और हीरों की तलाश में खो भी गए, तो भी बहुत कुछ पा लिया जाता है, उस खोने में भी, अंनत की यात्रा पर जो निकलता है, वे डूबने को भी उबरना समझते हैं।-ओशो
सृजन कठिन है, विध्वंस आसान : सृजन कठिन है, विध्वंस आसान है: इस दुनिया में जो लोग बना नहीं सकते, वे मिटाने में लग जाते है, जो कविता नहीं रच सकते, वे आलोचक हो जाते है। जो धर्म का अनुव नहीं कर सकते, वे नास्तिक हो जाते है। जो ईश्वर की खोज नहीं कर सकते, वे कहते हैं ईश्वर है ही नहीं। अंगूर खट्टे हैं, इनकार करना आसान है, स्वीकार करना कठिन। जो समर्पित नहीं हो सकते, वे कहते हैं-समर्पित होएं क्यों? मनुष्य की गरिमा उसके संकल्प में है, समर्पण में नहीं। जो समर्पित नहीं हो सकते, वे कहते है-कायर समर्पित होते हैं, बहादुर, वीर तो लड़ते हैं। ध्यान रखना, सृजन कठिन है, विध्वंस आसान है। जो माइकल एंजलो नहीं हो सकता। वह अडोल्फ हिटलर हो सकता है। जो कालिदास नहीं हो सकता, वह जौसेफ स्टैलिन हो सकता है। जो बानगाग नहीं हो सकता, वह माओत्से तुंग हो सकता है। विध्वंस आसान है।-ओशो।
Wednesday, 9 October 2013
धर्म नहीं धार्मिकता
धर्म सिद्धांत नहीं है। धर्म फिर क्या है? धर्म ध्यान है, बोध है, बुद्धत्व है। इसलिए मैं धार्मिकता की बात नहीं करता हूँ। चूंकि धर्म को सिद्धांत समझा गया है। इसलिए ईसाई पैदा हो गए, हिंदू पैदा हो गए, मुसलमान पैदा हो गए। अगर धर्म की जगह धार्मिकता की बात फैले, तो फिर ये भेद अपने आप गिर जाएंगे। धार्मिकता कहीं हिंदू होती है, कि कहीं मुसलमान या कहीं ईसाई होती है। बल्कि धार्मिकता तो बस धार्मिकता होती है। स्वास्थ्य हिंदू होता है, कि स्वास्थ्य मुसलमान, कि स्वास्थ्य ईसाई। प्रेम जैन होता है, प्रेम बौद्ध होता है, कि प्रेम सिक्ख होता है। जीवन, अस्तित्व इन संकीर्ण धारणाओं से नहीं बंधता। जीवन अस्तित्व इन संकीर्ण धारणाओं का अतिक्रमण करता है। उनके पार जाता है।-ओशो
Tuesday, 20 August 2013
देह तुम्हारा मंदिर है।
देह का सम्मान करो-मैं चाहता हूं कि तुम इस सत्य को ठीक-ठीक अपने अंतस्तल की गहराई में उतार लो। देह का सम्मान करे, अपमान न करना। देह को गर्हित न कहना, निंदा न करना। देह तुम्हारा मंदिर है। मंदिर के भीतर देवता भी विराजमान है। मगर मंदिर के बिना देवता भी अधूरा होगा। दोनों साथ है, दोनों समवेत, एक स्वर में आबद्ध, एक लय में लीन। यह अपूर्व आनंद का अवसर है। इस अवसर को तूम खँड़ सत्यों में तोड़ो।-ओशो।
नमस्कार का अदभुत ढ़ंग, इस देश ने नमस्कार का एक अदभुत ढंग निकाला। दुनिया मैं वैसा कहीं भी नहीं है। इसे देश ने कुछ दान दिया है, मनुष्य की चेतना को, अपूर्व। यह देश अकेला है, जब दो व्यक्ति नमस्कार करते है, तो दो काम करते है। एक तो दोनों हाथ जोड़ते है। दो हाथ जोड़ने का मतलब होता है, दो नहीं एक। दो हाथ दुई के प्रतीक है, द्वैत के प्रतीक है। उन दोनों को हाथ जोड़ने का मतलब होता है, दो नहीं एक है। उस एक का ही स्मरण दिलाने के लिए। दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करते है। और, दोनों को जोड़कर जो शब्द उपयोग करते है। वह परमात्मा का स्मरण होता है। कहते है-राम-राम, जयराम, या कुछ भी, लेकिन वह परमात्मा का नाम होता है। दो को जोड़ा कि परमात्मा का नाम उठा। दुई गई कि परमात्मा आया। दो हाथ जुड़े और एक हुए कि फिर बचा क्या-हे राम।-ओशो
लोग व्यर्थ की चीजें बचाने में जीवन गंवा देते हैं और जीवन का असली मालिक मर ही जाता है, उसे बचा ही नहीं पाते।-ओशो
प्रेम को जानने का उपाय पत्थर को सुंदर मूर्ति में निर्मित कर लेना, प्रेम को जानने का एक उपाय है। साधारण शब्दों को जोड़ कर एक गीत रच लेना, प्रेम को जानने का एक उपाय है। नाचना, कि सितार बजाना, कि बांसुरी पर एक तान छेड़ना, ये सब प्रेम के ही रूप है।-ओशो
स्त्रोत : प्रेसपालिका (पाक्षिक) जयपुर, राजस्थान, से साभार!
Saturday, 6 July 2013
आंसुओं से भयभीत मत होना
हम भी खो जाएंगे कल : जहां हम बैठे हैं, उस जमीन में नामालूम कितने लोगों की कब्र बन गई होगी। जिस रेत पर हम बैठे हैं, वह रेत नामालूम कितने लोगों की जिंदगी की राख का हिस्सा है। कितने लोग इस पृथ्वी पर रहे हैं और कितने लोग खो गए हैं! आज कौन सा उनका निशान है? कौन सा उनका ठिकाना है? उन्होंने क्या नहीं सोचा होगा, क्या नहीं किया होगा! कितने-कितने....मैं सुनता हूँ कि द्वारिका सात बार बनी और बिगड़ी। सात करोड़ बार बन-बिगड़ गई होगी। कुछ पता नहीं है। इतना अंतहीन है, विस्तार यह सब, इसमें सब रोज बनता है और बिगड़ जाता है। लेकिन कितने सपने देखे होंगे उन लोगों ने! कितनी इच्छाएं की होंगी कि ये बनाएं, ये बनाएं। सब राख और रेत हो गया, सब खो गया। हम भी खो जाएंगे कल। हमारे भी बड़े सपने हैं। हम भी क्या-क्या नहीं कर लेना चाहते हैं! लेकिन समय की रेत पर सब पुंछ जाता है। हवाएं आती हैं और सब बह जाता है।-ओशो
सेक्स और समाधि : यह अच्छा ही है कि तुम सेक्स से थक जाते हो, अब किसी डॉक्टर के पास कोई दवा लेने मत चले जाना। यह कुछ भी सहायता नहीं कर पाएगी...ज्यादा से ज्यादा यह तुम्हारी इतनी ही मदद कर सकती है कि अभी नहीं तो जरा और बाद में थकना शुरू हो जाओगे। अगर तुम वास्तव में ही सेक्स से थक चुके हो तो यह एक ऐसा अवसर बन सकता है कि तुम इसमें से बाहर छलॉंग लगा सको।
काम वासना में अपने आपको घसीटते चले जाने में क्या अर्थ है? इसमें से बाहर निकलो। और मैं तुम्हें इसका दमन करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। यदि काम वासना में जाने की तुम्हारी इच्छा में बल हो और तुम सेक्स में नहीं जाओ तो यह दमन होगा, लेकिन जब तुम सेक्स से तंग आ चुके हो या थक चुके हो और इसकी व्यर्थता जान ली है, तब तुम सेक्स को दबाए बगैर इससे छुटकारा पा सकते हो और सेक्स का दमन किए बिना जब तुम इससे बाहर हो जाते हो तो इससे मुक्त हो जाते हो।
काम वासना से मुक्त होना एक बहुत बड़ा अनुभव है। काम से मुक्त होते ही तुम्हारी ऊर्जा ध्यान और समाधि की ओर प्रेरित हो जाती है।-आचार्य रजनीश ओशो
आंसुओं से भयभीत मत होना : आंसुओं से कभी भी भयभीत मत होना। तथाकथित सभ्यता ने तुम्हें आंसुओं से अत्यंत भयभीत कर दिया है। इसने तुम्हारे भीतर एक तरह का अपराध भाव पैदा कर दिया है। जब आंसू आते हैं तो तुम शर्मिंदा महसूस करते हो। तुम्हें लगता है कि लोग क्या सोचते होंगे? मैं पुरुष होकर रो रहा हूँ, यह कितना स्त्रैण और बचकाना लगता है। ऐसा नहीं होना चाहिये। तुम उन आंसुओं को रोक लेते हो और तुम उसकी हत्या कर देते हो जो तुम्हारे भीतर पनप रहा होता है। जो भी तुम्हारे पास है, आंसू उनमें सबसे अनूठी बात है, क्योंकि आंसू तुम्हारे अंतस के छलकने का परिणाम हैं। आंसू अनिवार्यत: दुख के ही द्योतक नहीं हैं; कई बार वे भावातिरेक से भी आते हैं, कई बार वे अपार शांति के कारण आते हैं, और कई बार वे आते हैं प्रेम व आनंद से। वास्तव में उनका दुख या सुख से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ भी जो तुमारे हृदय को छू जाये, कुछ भी जो तुम्हें अपने में आविष्ट कर ले, कुछ भी जो अतिरेक में हो, जिसे तुम समाहित न कर सको, बहने लगता है, आंसुओं के रूप में। इन्हें अत्यंत अहोभाव से स्वीकार करो, इन्हें जीयो, उनका पोषण करो, इनका स्वागत करो, और आंसुओं से ही तुम जान पाओगे प्रार्थना करने की कला।-आचार्य रजनीश ओशो (सौजन्य से-ओशो न्यूज लेटर)
देश-द्रोही या मानव द्रोही : मैं कहूंगा कि भारत को पहला देश होना चाहिए जो राष्ट्रीयता छोड़ दे। यह अच्छा होगा कि कृष्ण, बुद्ध, महावीर, पतंजलि और गोरख का देश राष्ट्रीयता छोड़ दे और कहें कि हम अंतर्राष्ट्रीय भूमि है। भारत को तो संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमि बन जाना चाहिए। कह देना चाहिए, यह पहला राष्ट्र है, जिसको हम संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंपते है। सम्हालो। कोई तो शुरूआत करे----। और यह शुरूआत हो जाए तो युद्धों की कोई जरूरत नहीं है, ये युद्ध जारी रहेगें, जब तक सीमाएं रहेंगी। ये सीमाएं जानी चाहिए। तो ठीक ही कहते हो, कह सकते हो मुझे देश-द्रोही। इन अर्थों में कि मैं मानव-द्रोही नहीं हूँ। लेकिन तुम्हारे सब देश-प्रेमी मानव-द्रोही है। देश-प्रेम का अर्थ होता है-मानव-द्रोह। देश-प्रेम का अर्थ होता खण्डों में बांटो। तुमने देखा न जो आदमी प्रदेश को प्रेम करता है। वह देश का दुश्मन हो जाता है, और जो जिले को प्रेम करता है। वह प्रदेश का दुश्मन हो जाता है। और जो जिले को प्रेम करता है, वह प्रदेश का भी दुश्मन हो जाता है। मैं दुश्मन नहीं हूँ देश का, क्योंकि मेरी धारणा अंतर्राष्ट्रीय है। यह सारी पृथ्वी एक है। मैं बड़े के लिए छोटे को विसर्जित कर देना चाहता हूँ।-आचार्य रजनीश ओशो
भगवान नहीं भगवत्ता : भगवान पर जोर नहीं देता हूँ, भगवत्ता पर जोर देता हूँ। भगवत्ता का अर्थ हुआ, नहीं कोई पूजा करनी है, नहीं कोई प्रार्थना, नहीं किन्हीं मंदिरों में घड़ियाल बजाने है, न पूजा के थाल सजाने हैं, न अर्चना, न विधि-विधान, न यज्ञ-हवन, वरन अपने भीतर वह जो जीवन की सतत धारा है। उस धारा का अनुभव करना है, वह जो चेतना है, चैतन्य है। वह जो प्रकाश है स्वयं के भीतर, जो बोध की छिपी हुई दुनियां है, वह जो बोध का रहस्यमय संसार है, उसका साक्षात्कार करना है, उसके साक्षात्कार से जीवन सुगंध से भर जाता है। ऐसी सुगंध से जो फिर कभी चुकती नहीं। उस सुगंध का नाम भगवत्ता है। स्रोत-ओशो-‘‘परम रस का अनुभव’’
Wednesday, 26 June 2013
बाहर की जिंदगी खेल से ज्यादा नहीं है।
बाहर की जिंदगी का बहुत अंतिम अर्थ नहीं है। बाहर की जिंदगी खेल से ज्यादा नहीं है। हां, ठीक से खेल लें, इतना काफी है। क्योंकि ठीक से खेलना भीतर ले जाने में सहयोगी बनता है।-ओशो
बाहर से जाग जाना बहुत आसान है, लेकिन भीतर की झूठी धार्मिक दिशा से जागना बहुत कठिन है।-ओशो
बाहर से जाग जाना बहुत आसान है, लेकिन भीतर की झूठी धार्मिक दिशा से जागना बहुत कठिन है।-ओशो
Friday, 31 May 2013
धर्म का रास्ता ऐसे ही है जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं।
जो आदमी भीड़ के पीछे चलता है वह आदमी झूठे धर्म के रास्ते पर चलेगा। जो आदमी अकेला चलने की हिम्मत जुटाता है वह आदमी धर्म के रास्ते पर जा सकता है।-आचार्य ओशो।
कुछ थोड़े से लोग कभी भीड़ से चूक जाते हैं और उस रास्ते पर चले जाते हैं जो धर्म का रास्ता है। और ध्यान रहे, भीड़ कभी धर्म के रास्ते पर नहीं जाती। धर्म के रास्ते पर अकेले लोग जाते हैं। क्योंकि धर्म के रास्ते पर कोई राजपथ नहीं है, जिस पर करोड़ों लोग इकट्ठे चल सकें। धर्म का रास्ता पगडंडी की तरह है, जिस पर अकेला आदमी चलता है। दो आदमी भी साथ नहीं चल सकते। और यह भी ध्यान रहे, धर्म का रास्ता कुछ रेडीमेड, बना- बनाया नहीं है, कि पहले से तैयार है, आप जाएंगे और चल पड़ेंगे। धर्म का रास्ता ऐसे ही है जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं। कोई रास्ता नहीं है बना हुआ, पक्षी उड़ता है और रास्ता बनता है, जितना उड़ता है उतना रास्ता बनता है। और ऐसा भी नहीं है कि एक पक्षी उड़े तो रास्ता बन जाए, तो दूसरा उसके पीछे उड़ जाए। फिर रास्ता मिट जाता है। उड़ा पक्षी, आगे बढ़ गया, आकाश में कोई निशान नहीं बनते।-आचार्य रजनीश ओशो।
Monday, 20 May 2013
पंडे, पुजारी, साधु और सन्यासी! मई-II, 2013
धर्म के रास्ते : एक झूठे धर्म का रास्ता है, एक सच्चे धर्म का रास्ता है। सच्चे धर्म के रास्ते पर आदमी चला जाए तो उसका शोषण नहीं किया जा सकता। उसे झूठे धर्म के रास्ते पर ले जाओ, तो पंडे हैं, पुरोहित हैं, पुजारी हैं, मौलवी हैं, वे सब उसका शोषण कर सकते हैं।-ओशो
जो भी बनता है, मिटता है, वह ईश्वर नहीं है।-ओशो
पंडे, पुजारी, साधु और सन्यासी : आदमी को भटकाने वाले लोग उतने नास्तिक नहीं हैं, जितने कि पंडे हैं, पुजारी हैं, साधु हैं, सन्यासी हैं। जो शोषण करते हैं धर्म का। जो धर्म के नाम पर जीते हैं। जिन्होंने धर्म को आजीविका बना रखा है। जिन्होंने धर्म को धंधा बना रखा है। जो लोग भगवान को भी बेचते हैं और भगवान के बेचने पर जीते हैं। उन लोगों ने एक झूठा, एक सब्स्टीटयूट रिलीजन, एक परिपूरक धर्म बना रखा है। इसके पहले कि कोई आदमी भीतर जाए, वे उस झूठे रास्ते पर उसे लगा देते हैं। उस रास्ते पर करोड़ों-करोड़ों लोग चल रहे हैं-हिंदुओं के नाम से, मुसलमानों के नाम से, ईसाइयों के नाम से। और वे करोड़ों-करोड़ों लोग कहीं भी नहीं पहुंचते। बाहर भी कहीं नहीं पहुंचता आदमी और भीतर भी गलत रास्ते को पकड़ कर कहीं भी नहीं पहुंचता।-ओशो
भगवान : भगवान की कोई मूर्ति नहीं है और भगवान का कोई मंदिर नहीं है। और या फिर सभी मूर्तियां भगवान की हैं और सब कुछ भगवान का मंदिर है।
धर्म वह है जिससे हम बनते हैं और जिसमें हम लीन होते हैं। हम धर्म को नहीं बना सकते।-ओशो
Friday, 3 May 2013
प्रार्थना भी भय का विस्तार....! मई-I, 2013
मनुष्य के जीवन को क्या हो गया है? यह मनुष्य की इतनी अशांति और दुख की दशा क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मनुष्य जो होने को पैदा हुआ है, वही नहीं हो पाता है, जो पाने को पैदा हुआ है, वही नहीं उपलब्ध कर पाता है, इसीलिए मनुष्य इतना दुखी है? अगर कोई बीज वृक्ष न बन पाए तो दुखी होगा। अगर कोई सरिता सागर से न मिल पाए तो दुखी होगी। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मनुष्य जो वृक्ष बनने को है, वह नहीं बन पाता है और जिस सागर से मिलने के लिए मनुष्य की आत्मा बेचैन है, उस सागर से भी नहीं मिल पाती है, इसीलिए मनुष्य दुख में हो? धर्म मनुष्य को उस वृक्ष बनाने की कला का नाम है।-ओशो
अधार्मिक होना और दुखी होना, एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। इसलिए कोई कभी कल्पना न करे कि अधार्मिक होते हुए भी कोई व्यक्ति कभी आनंदित हो सकता है। यह असंभव है। जैसे शरीर की बीमारियां हैं, और शरीर से बीमार आदमी कैसे आनंदित हो सकता है? शरीर तो स्वस्थ चाहिए। वैसे ही आत्मा की बीमारियां भी हैं। अधर्म आत्मा की बीमारी का नाम है। जो आत्मा की बीमारी में पड़ा हुआ है वह कैसे आनंदित हो सकता है? शरीर दुखी हो तो भी एक आदमी भीतर आनंदित हो सकता है। लेकिन भीतर की आत्मा ही दुखी हो तब तो आनंदित होने की कोई उम्मीद नहीं है, कोई आशा नहीं है। लेकिन जिस आत्मा को आनंदित करना है, उस आत्मा के लिए हम कुछ भी नहीं करते, शरीर के लिए सब कुछ करते हैं।-ओशो
सत्य होगा तो एक ही होगा। लेकिन एक सत्य के नाम पर जब तीन सौ संप्रदाय खड़े हो जाते हैं, तो सत्य की खोज करनी भी मुश्किल हो जाती है। हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, जैन हैं-और धार्मिक आदमी कहीं भी नहीं है। धार्मिक आदमी नहीं है, इसलिए इतनी बेचैनी है, इतनी अशांति है, इतना दुख है।-ओशो
रात सोते वक्त खयाल रखना। जैसे मंदिर में दंडवत कर रहे हो, ऐसे बिस्तर पर सो जाना। उसी दंडवत के भाव में नींद लग जाऐ। सुबह उठना, तो परिक्रमा का भाव और जो भी करना, उसे उसकी ही सेवा समझना।-ओशो
सत्य एक क्षण में दिखाई पड़ सकता है। बस एक ही शर्त है कि उस क्षण तुम सोचो मत। जरा सा विचार और वर्तुल शुरू हो जाता है। तुम दूर निकलना शुरू हो गए। तुम बड़ी दूर पहुँच गए। जरा सा सो बड़ी दूर ले जाता है। जरा सा अ-सोच तत्क्षण तुम्हें स्वयं से मिला देता है।-ओशो
Tuesday, 23 April 2013
प्रार्थना भी भय का विस्तार....! अप्रेल-II, 2013
बुराई : बुराई छोटी-बड़ी नहीं होती। और ध्यान रहे, बुराई एक, दो और तीन भी नहीं होती। एक बुराई काफी है। सब बुराईयां उसके पीछे आ जाती हैं। एक से दरवाजा खुल गया कि पूरी भीड़ आ जाती है।-ओशो
प्रेम : अगर प्रेम में उतर गये, तो प्रेम की समझ तो आ जाऐगी, लेकिन अध्ययन नहीं हो सकेगा। अध्ययन के लिये दूरी चाहिये और तटस्थता चाहिये और फासला चाहिये। प्रेम के लिये दूरी मिटनी चाहिये, सब फासले गिरने चाहिये। तब प्रेम की समझ का तो उदय होगा, लेकिन उस समझ को हम अध्ययन नहीं कह सकते।-ओशो
क्रान्ति : तथ्य क्रान्ति ले आते हैं। सत्य स्वयं क्रान्ति है। जैसे ही सत्य दिखाई पड़ता है, स्वयं ही क्रान्ति हो जाती है।-ओशो
सरलता : तेईस घण्टे तुम बेईमान हो, झूठ बोल रहे हो, चोरी कर रहे हो, धोखा दे रहे हो और एक घण्टे के लिये तुम एकदम सरल हो गये। सरलता कोई खेल है? कि तुमने जब चाहा, तब सम्हाल लिया। यह असम्भव है।-ओशो
अहंकार : सिकुड़ा हुआ आदमी अहंकार से भर जाऐगा, फैला हुआ आदमी मिटता है। तुम जितने फैल जाओगे, अहंकार उतना ही कम हो जाएगा। तुम जितने सिकुड़ जाओगे, अहंकार उतना ही ज्यादा हो जायेगा। अहंकार एक तरह का संकुचन है। ब्रह्म- अनुभव एक तरह का विस्तार है।-ओशो
नींद : ईश्वर को जानने चलेंगे तो नींद टूटेगी और नींद में हमारा बड़ा स्वार्थ है, क्योंकि हमने अब तक जन्मों-जन्मों तक नींद को हीं संवारा है, वही हमारी निर्मिति है।-ओशो
जीवन : जीवन को जानने की कुंजी वर्तमान में जीना है। जो उपस्थित है, उसमें समग्र रूपेण चेतना को उपस्थित कर देना है।-ओशा
मौत : जिन्दगी भर हम मौत से अपने को छिपाए रखते हैं। झूठी है यह बात। मौत को जानना और पहचानना है।-ओशो
अहंकारी : सौ में से निन्यानबे-धर्म की खोज में गए लोग अहंकारी होते हैं। इसलिये धार्मिक व्यक्तियों में विनम्रता पानी बहुत कठिन है। धार्मिक आजादी अक्सर अहंकारी होगा, बल्कि भयंकर अहंकारी होगा।-ओशो
सुख-दुख : तर्क सीधा है-आप अपने लिये सुख चाहते हैं, दूसरे के लिये दुख चाहते हैं। अगर दूसरे को दुख देकर भी खुद को सुख मिले, तो आप सुख चाहते हैं। सारी दुनिया को दुख मिले, तो कोई चिन्ता नहीं, आपको सुख मिलना चाहिये। सबको दुख मिले तो भी चलेगा। यही तो असाधु का भाव है।-ओशो
मापदण्ड : हम तोलते हैं आदमी को, क्या है उसके पास, कितनी शिक्षा, कितना पद, कितनी बड़ी कुर्सी, सिंहासन। क्या है तुम्हारे पास, वही तुम हो-यह हमारा मापदण्ड है।-ओशो
मित्र-शत्रु : जब तक राम को कोई शरण की तरह अनुभव न कर ले, तब तक इस जगत में सभी शत्रु हैं, मित्र कोई भी नहीं।-ओशो
भय : आंख बन्द करके कभी देखें तो आप पाएंगे, सिवाय भय के और भीतर कुछ भी नहीं। इस भय के कारण आप भगवान की प्रार्थना भी कर सकते हैं, लेकिन वह प्रार्थना भी भय का विस्तार ही होगा।-ओशो
सपने : हम सपने में जीते हैं, जहां है वहां नहीं जीते, जहां नहीं हैं, वहां जीते हैं।-ओशो
शब्द-नि:शब्द : धर्म के आयाम में शब्द से अर्थ का उदय नहीं होता। नि:शब्द से अर्थ का उदय होता है। शब्दों को हटाएं, तो नि:शब्द की धारा प्रगट होगी।-ओशो
धर्म : धर्म है जागरण का प्रयास। धर्म है पूरी तरह चेतना को एक्सपेंशन, चेतना को और विस्तार देना।-ओशो
स्त्रोत : प्रेसपालिका (पाक्षिक) जयपुर, राजस्थान, से साभार!
Saturday, 6 April 2013
सिर्फ ध्यान स्वतंत्र बनाता है। अप्रेल-I, 2013
ध्यान का अर्थ है, इस क्षण में होना, इस क्षण के पार न जाना।-ओशो
सिवाय ध्यान के मृत्यु को कोई और चीज पार नहीं करती है। ज्ञान नहीं, ध्यान ही केवल मृत्यु में भी साथी हो सकता है। सिर्फ ध्यान स्वतंत्र बनाता है।-ओशो
एक भिखमंगा भी त्यागी हो सकता है। क्योंकि त्याग का कोई सम्बन्ध, कितना छोड़ा है, इससे नहीं, बल्कि छोड़ने के भाव से है।-ओशो
Friday, 15 March 2013
हंसती हुई मनुष्यता-ओशो वाणी : मार्च-II, 2013
जो हमारे पास है वह हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है। जो हमारे पास नहीं है, उसका हम हिसाब लगाये बैठे हैं। और जो हमारे पास है, वह इतना है कि जो हमारे पास नहीं है, उसका हिसाब लगाना ही नासमझी है, उसका कोई मूल्य ही नहीं है। कठिनाई यह है कि जो मिला हुआ है-वह टेकन फॉर ग्रांटेड हो जाता है। वह है ही, उसकी कोई बात ही नहीं करनी है, हमें। हमारा दावा है कि हमें यह मिलना चाहिये। अगर मेरी आंखें कल चली जायें तो मैं किससे शिकायत करूंगा? और जब तक मेरे पास आंख थी, तब तक मैंने कुछ भी नहीं किया उन आंखों से-न मैंने फूल देखे, न मैंने चांदनी देखी, न मैंने कोई सुंदर चेहरा देखा-मैंने इन आंखों से कुछ भी नहीं किया। लेकिन अब आंखों के लिये रो रहा हूँ।-ओशो
मृत्यु में बड़ी सुरक्षा है: जीवन के पास होना खतरनाक है, क्योंकि जीवन है-असुरक्षा। मृत्यु में बड़ी सुरक्षा है। एक बार मर गये सो मर गये, फिर न कोई बीमारी लगती, फिर न कोई दुबारा मृत्यु हो सकती, न दिवाला निकलता, न चोरी होती, न डाका पड़ता। फिर तो विश्राम करो कब्र में, विश्राम ही विश्राम है।-ओशो
मैं धन विरोधी नहीं हूँ। न धन विरोधी हूँ, न ध्यान विरोधी हूँ। मैं मानता हूँ कि ध्यानी के हाथ में धन हो तो धन भी अभूतपूर्व रूप से उपयोगी हो जाता है और धनी के हाथ में ध्यान लगे, तो ध्यान भी सुगमता से सधता है।-ओशो
दांव : सब कुछ दांव पर लगाना बड़ी हिम्मत की बात है, दस्साहस की बात है। सब कुछ दांव पर लगाने का अर्थ है: पीछे लौटने की सीढी ही तोड़ दी, सेतु ही गिरा दिया। ‘हॉं’ जो कही तो उसमें कहीं भी कोई ‘नहीं’ की गुजाइश न रखी। फिर गर्दन कटे तो कटे, जीवन रहे तो रहे, न रहे तो न रहे।-ओशो
लाभ ही लाभ : पश्चिम समर्थ है स्वर्ग बसाने में और पूरब के पास ध्यान का विज्ञान है। दोनों का लेन-देन हो सकता है। इस सौदे में किसी का नुकसान नहीं होगा, दोनों लाभ ही लाभ में रहेंगे।-ओशो
उत्सव : हर घड़ी उत्सव उचित है, क्योंकि जब तुम उत्सव में हो, तभी तुम परमात्मा के निकट हो और जब तुम उत्सव में नहीं हो, तुम परमात्मा के बाहर हो, उत्सव में होना परमात्मा में होना है, उत्सव में न होना परमात्मा से बाहर होना है। तुम्हारी मर्जी! तुम्हें अगर परमात्मा से बाहर-बाहर जीना हो, तो जियो। फिर संताप, विषाद होगा, पीड़ा, चिंता होगी, चुनाव तुम्हारा है। जो ऊर्जा उत्सव बन सकती थी, वही चिंता और विषाद बनेगी।-ओशो
हंसती हुई मनुष्यता : हंसते हुए इंसान से और हंसते हुए क्षणों में पाप करना असंभव है। सारे पापों के पीछे उदासी, दुख, अंधेरा, बोझ, भारीपन, क्रोध, घृणा-ये सब है। अगर हम हंसती हुई मनुष्यता को पैदा कर सकें तो दुनिया के नब्बे प्रतिशत पाप तत्कक्षण गिर जायेंगे। जिन लोगों ने पृथ्वी को उदास किया है, उन लोगों न पृथ्वी को पापों से भर दिया है।-ओशो
ऐसे हंसो कि तुम्हारा पूरा जीवन एक हंसी बन जाये। इस भांति जियो कि पूरा जीवन एक मुस्कुराहट बन जाये। इस भांति जियो कि आसपास के लोगों की जिंदगी में मुस्कुराहट फैल जाये। इस भांति जियो कि सारी जिंदगी एक हंसी के खिलते हुए फूलों की कतार हो जाये।-ओशो
Sunday, 10 March 2013
मृत्यु सुविधापूर्ण है-ओशो वाणी : मार्च-I, 2013
दुख हमारा चुनाव है : जिंदगी बहुत मौके दे रही है, हम सब मौके चूक जाते हैं और हर चीज में हमने तरकीबें बना रखी हैं। अगर मुझे एक सुंदर चेहरा दिखाई पड़ा तो उस सुंदर चेहरे से मुझे जो सुख मिल सकता था, वह मैं नहीं लूंगा; उससे दुख ले लूंगा-कि वह किसी और की पत्नी है, किसी और का पति है, वह किसी और का बेटा है। तो मैं चूक गया और वह जिसका बेटा है, जिसकी पत्नी है, जिसका पति है, वह किसी और का चेहरा देख कर दुखी हुआ जा रहा है। वह अलग दुखी हो रहा है, हम अलग दुखी हो रहे हैं। सारी दुनिया दुखी हो रही है। दुख हमारा चुनाव है। तुम दुख चुन रहे हो तो दुख इकट्ठा होता चला जाता है और फिर दब जाओगे उसके नीचे, फिर परेशान हो जाओगे। दुख को चुनो मत। कौन तुमसे कहता है, दुख को चुनो? सुख को चुनो।-ओशो
दुनिया में तमाशबीनी बढती चली गई। इतनी बढ गई है कि अब हर चीज में तमाशबीनी है। तुम प्रेम नहीं करते, जब प्रेम वगैरह का खयाल उठता है, फिल्म देख आये। अरे अब दूसरे पेशेवर प्रेम करने वाले मौजूद है, जो तुमसे अच्छे ढंग से कर सकते हैं, क्या-क्या लहजे से करते हैं, तो तुम काहे को मेहनत करो अलग से! फिल्म ही देख आये, मामला खत्म हो गया।-ओशो
यह जीवन एक-एक क्षण बहुमूल्य है, क्योंकि इस एक-एक क्षण में तुम्हारे जीवन में क्रान्ति घट सकती है, तुम्हारे भीतर बुद्धत्व का अवतरण हो सकता है। तुम्हारे भीतर वही फूल खिल सकते हैं, जो बुद्ध की चेतना में खिले। वही बांसुरी तुमसे बज सकती है, जो कृष्ण के ओठों पर बजी।-ओशो
भय और प्रेम बड़ी विपरीत अवस्थाएँ हैं। भय में आदमी सिकुड़ता है, संकुचित होता है, छोटा होता है। प्रेम में फैलता है, विस्तीर्ण होता है।-ओशो
पिछले जन्मों के कर्मों के फल : लोग भी अजीब हैं, पिछले जन्मों की तो बातें करते हैं कि पिछले जन्मों के कर्मों के फल मिल रहे हैं और इसी जन्म में जो उपद्रव करते रहते हैं, उनका गणित बिठाते नहीं! पिछला जन्म था कि नहीं, यह भी तुम्हें पता नहीं है। मगर यह जन्म तो साफ है। इसी जन्म के हिसाब जरा देखो।-ओशो
जीवन का खजाना अकूत है, उसकी गहराई अथाह है, उसकी गहराई अथाह है। अगर कहीं कोई ईश्वर है तो वह जीवन में व्याप्त है, रोएं-रोएं में, कण-कण में, वही प्रतिध्वनित है। बाहर वह, भीतर वह। दशों दिशाओं में वही है।-ओशो
जीवन और मृत्यु : जीवन ही खतरनाक है। मृत्यु सुविधापूर्ण है। मृत्यु से ज्यादा आरामदायक और कुछ भी नहीं है। इसलिये लोग मृत्यु को वरण करते हैं, मृत्यु जीवन का निषेध है। लोग ऐसे जीते हैं, जिसमें कम से कम जीना पड़े, न्यूनतम-क्योंकि जितने कम जियेंगे उतना कम खतरा है, जितने ज्यादा जियेंगे उतना ज्यादा खतरा है। जितनी त्वरा होगी जीवन में उतनी ही आग होगी, उतनी ही तलवार में धार होगी।-ओशो
Wednesday, 6 February 2013
ओशो विचार-ओशो वाणी : फरवरी, 2013
1. अगर जीतना हो मन को तो पहला नियम यह है कि लड़ना मत।
5-जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी गुणों (दुर्गुणों से सम्पन्न) सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं। वे दूसरे लोगों और समाज पर हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं। ऐसे लोग राजनेता बन जाते हैं या वे पुरोहित बन जाते हैं और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरों को भी नहीं करने दे सकते। इसलिए वे दूसरे लोगों की हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं।
2. हम एक वृक्ष के पास खड़े हैं। उसमें कांटे लगे हैं और फूल लगा है तो लगा है। हम न तो यह कहते कि फूल अच्छा है, न यह कहते हैं कि कांटे बुरे हैं।
3. साक्षी होना कोई कर्म नहीं, कृत्य नहीं और वह साक्षी हो जाना ध्यान है। साक्षी हो जाना ध्यान है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है।
4. घड़ी, दो घड़ी के लिये अपने को पूरा छोड़ो और जो हो रहा है, उसे पूरा स्वीकार कर लो। फिर कुछ होगा। वह कुछ होना ध्यान है।
6-सफल होता है आदमी, तो मौत बहुत दूर मालूम पड़ती है। असफल होता है आदमी, तो खयाल आने लगते हैं उदासी के, मरने का भाव होने लगता है।
7-हमारे सभी दु:खों के पीछे मृत्यु छिपी है। अगर आप खोज करेंगे, तो आप जिन बातों को भी दुख मानते हैं, उन सबके पीछे मृत्यु की छाया मिलगी।
------------------
1-इस दुनिया में सच कहना दुश्मन बनाना है। इस दुनिया में किसी से भी सच कहना दुश्मन बनाना है। झूठ बड़ी मित्रताएं स्थापित करता है। कभी एक दफा देखें, चौबीस घण्टे तय कर लें कि सच ही बोलेंगे! आप पाएंगे सब मित्र विदा हो गए| चौबीस घंटा, इससे ज्यादा नहीं। पत्नी अपना सामान बांध रही है, लड़के-बच्चे कह रहे हैं : नमस्कार। मित्र कह रहे हैं कि तुम ऐसे आदमी थे! सारा जगत शत्रु हो जायेगा।-ओशो
2-ध्यान रहे, दुनिया में कोई आदमी आपको सन्देह में नहीं डाल सकता। सन्देह में डाल ही तब सकता है, जब सन्देह आपके भीतर भरा हो।-ओशो
3-अंधे लोग लड़ते हैं, उद्विग्न हो जाते हैं। वे आपका सिर तोड़ने को राजी हो जायेंगे, लेकिन आपकी बात सुनने को राजी नहीं होंगे।-ओशो
4-दर्शनशास्त्र खुजली की तरह है। खुजाने का मन होता है, इसकी बिना फिक्र किये कि परिणाम क्या होगा। खुजाते वक्त अचछा भी लगता है, लेकिन फिर लहू निकल आता है और पीड़ा होती है।-ओशो
5-प्रेम तो कला है, स्वयं को रूपान्तरित करने की। अगर एक को प्रेम किया, तो आप एक हो जायेंगे और या फिर अनंत को प्रेम करें, तो आप अनंत हो जायेंगे।-ओशो
6-सुख के क्षण में सुख क्षणभंगुर है, तत्क्षण दिखाई पड़ जाता है। सुख के क्षण में सुख जा चुका, यह अनुभव में आ जाता है। सुख के क्षण में दुख मौजूद हो जाता है।-ओशो
7-जीवन वही हो जाता है, जिस भाव को लेकर हम जीवन में प्रविष्ट होते हैं। जीवन वही हो जाता है, जो हम उसे बनाने को आतुर, उत्सुक और प्यासे होते हैं। जीवन मिलता नहीं, निर्मित करना होता है। जीवन बना-बनाया उपलब्ध नहीं होता, सर्जन करना होता है। जन्म के साथ मिलता है-अवसर, जीवन नहीं।-ओशो
8-मेरी मौलिक दृष्टि जगत को प्रेम से भरने की है। प्रेम मेरे लिये धर्म है। सार रूप में, निचोड़ रूप में धर्म-प्रेम है।-ओशो
9-धार्मिक व्यक्ति भय से प्रभावित नहीं होता, न लोभ से आन्दोलित होता है, क्योंकि धार्मिक व्यक्ति तो सत्य की तलाश में होता है।-ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.02.13 & 16.02.13 के अंक से साभार!
1-इस दुनिया में सच कहना दुश्मन बनाना है। इस दुनिया में किसी से भी सच कहना दुश्मन बनाना है। झूठ बड़ी मित्रताएं स्थापित करता है। कभी एक दफा देखें, चौबीस घण्टे तय कर लें कि सच ही बोलेंगे! आप पाएंगे सब मित्र विदा हो गए| चौबीस घंटा, इससे ज्यादा नहीं। पत्नी अपना सामान बांध रही है, लड़के-बच्चे कह रहे हैं : नमस्कार। मित्र कह रहे हैं कि तुम ऐसे आदमी थे! सारा जगत शत्रु हो जायेगा।-ओशो
2-ध्यान रहे, दुनिया में कोई आदमी आपको सन्देह में नहीं डाल सकता। सन्देह में डाल ही तब सकता है, जब सन्देह आपके भीतर भरा हो।-ओशो
3-अंधे लोग लड़ते हैं, उद्विग्न हो जाते हैं। वे आपका सिर तोड़ने को राजी हो जायेंगे, लेकिन आपकी बात सुनने को राजी नहीं होंगे।-ओशो
4-दर्शनशास्त्र खुजली की तरह है। खुजाने का मन होता है, इसकी बिना फिक्र किये कि परिणाम क्या होगा। खुजाते वक्त अचछा भी लगता है, लेकिन फिर लहू निकल आता है और पीड़ा होती है।-ओशो
5-प्रेम तो कला है, स्वयं को रूपान्तरित करने की। अगर एक को प्रेम किया, तो आप एक हो जायेंगे और या फिर अनंत को प्रेम करें, तो आप अनंत हो जायेंगे।-ओशो
6-सुख के क्षण में सुख क्षणभंगुर है, तत्क्षण दिखाई पड़ जाता है। सुख के क्षण में सुख जा चुका, यह अनुभव में आ जाता है। सुख के क्षण में दुख मौजूद हो जाता है।-ओशो
7-जीवन वही हो जाता है, जिस भाव को लेकर हम जीवन में प्रविष्ट होते हैं। जीवन वही हो जाता है, जो हम उसे बनाने को आतुर, उत्सुक और प्यासे होते हैं। जीवन मिलता नहीं, निर्मित करना होता है। जीवन बना-बनाया उपलब्ध नहीं होता, सर्जन करना होता है। जन्म के साथ मिलता है-अवसर, जीवन नहीं।-ओशो
8-मेरी मौलिक दृष्टि जगत को प्रेम से भरने की है। प्रेम मेरे लिये धर्म है। सार रूप में, निचोड़ रूप में धर्म-प्रेम है।-ओशो
9-धार्मिक व्यक्ति भय से प्रभावित नहीं होता, न लोभ से आन्दोलित होता है, क्योंकि धार्मिक व्यक्ति तो सत्य की तलाश में होता है।-ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.02.13 & 16.02.13 के अंक से साभार!
Friday, 4 January 2013
खुशी के खिलाफ समाज के ठेकेदार! ओशो वाणी : जनवरी, 2013
खुशी के खिलाफ : जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं| वे हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं| वे राजनेता बन जाते हैं| वे पुरोहित बन जाते हैं| और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरो को भी नहीं करने दे सकते| इसलिए वे हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं| जरा इसके पीछे का कारण देखो| अगर वह खुद जिंदगी का मजा नहीं ले सकता तो वह कम से कम तुम्हारे मजे में जहर तो घोल ही सकता है| इसीलिए सभी तरह के विकलांग एक जगह जमा होकर अपनी बुद्धि लगाते हैं, ताकि जोरदार नैतिकता का ढॉंचा खड़ा कर सकें और फिर उसके आधार पर हर चीज की भर्त्सना कर सकें|-ओशो
समाज के ठेकेदार : जो नैतिकतावादी, समाज के ठेकेदार हैं; उन्हीं का दुनिया को विषाक्त बनाने में सबसे बड़ा हाथ है| और ये लोग हर जगह हैं| ऐसे लोग ही ज्यादातर शिक्षक, शिक्षाविद, प्रोफेसर, कुलपति, संत, बिशप, पोप वगैरह बनते हैं; वे ऐसे बनना चाहते हैं, ताकि वे दूसरों की निंदा कर सकें| यहां तक कि वे इसके लिये सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं| अगर उन्हें दूसरों की निंदा करने का सुख मिले| वे हर कहीं हैं, कई परदों के पीछे छुपे हुए| और वे हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए काम करते हैं, सिर्फ तुम्हारी भलाई के लिए, इसलिए तुम उनके आगे रक्षाहीन हो| उनकी विरासत वास्तविक और बड़ी है| पूरे इतिहास पर उनका प्रभुत्व रहा है|-ओशो
अस्वस्थ व्यक्ति मजा ले ही नहीं सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है| जो गीत गा सकता है, जो नाच सकता है, वह नाचेगा और गाएगा, वह सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा| लेकिन जो नाच नहीं सकता, जो विकलांग है, जिसे लकवा मार गया है, वह कोने में पड़ा रहेगा और योजनाएँ बनाएगा कि दूसरों पर कैसे हावी हुआ जाए| वह कुटिल बन जाएगा| जो रचनाशील है, वह रचेगा| जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है|-------------------------------------------------
काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाता है : जब व्यक्ति कामवासना से थक जाता है तो तुरंत भीतर चंद्र ऊर्जा सक्रिय हो जाती है। जब सूर्य छिप जाता है तब चंद्र का उदय होता है। इसीलिए तो काम-क्रीड़ा के तुरंत बाद व्यक्ति को नींद आने लगती है। सूर्य ऊर्जा का काम समाप्त हो चुका, अब चंद्र ऊर्जा का कार्य प्रारंभ होता है। भीतर की सूर्य ऊर्जा काम-केंद्र है। उस सूर्य ऊर्जा पर संयम केंद्रित करने से, व्यक्ति भीतर के संपूर्ण सौर-तंत्र को जान ले सकता है। काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाता है। काम-केंद्र के सभी रहस्यों को जान सकता है। लेकिन बाहर के सूर्य के साथ उसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है।-आचार्य रजनीश ओशो
युक्तियुक्त मनुष्य और तर्कसंगत मनुष्य के बीच अंतर जानना बड़ा जरूरी है। एक युक्तियुक्त मनुष्य कभी सिर्फ तर्कसंगत नहीं होता, क्योंकि एक युक्तियुक्त मनुष्य अपने अनुभव से जानता है कि तर्कसंगत और तर्कहीनता दोनों ही जीवन के पहलू हैं; कि जीवन में तर्क और भावनाएं, मस्तिष्क और हृदय दोनों होते हैं।-आचार्य रजनीश ओशो
अंधों ने और अंधों के शोषकों ने मिलकर जो षड़यंत्र किया है, उसने करीब-करीब धर्म की जड़ काट डाली है| धर्म की साख है और अधर्म का व्यापार है|-आचार्य रजनीश ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.01.13 & 16.01.13 के अंक से साभार!
Friday, 7 December 2012
स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजने में पृथ्वी पर रास्ते बनाना भूल गए हैं| ओशो वाणी : दिसम्बर, 2012
जिसको तुम प्रेम करते हो, जिसकी जरा-जरा सी बात की तुम चिन्ता-फिकर करते हो, कि उसके पैर में मोच न आ जाए, इसकी फिकर लेते हो, तुम उसी को गोली मार सकते हो! अगर उसका व्यवहार तुम्हारे अहंकार के विपरीत हो ताए तो उसको जहर पिला सकते हो! उसी को तुम पहाड़ से ढकेल सकते हो! ऐसा तुम्हारा प्रेम, प्रेम नहीं हैं| जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है! प्रेम यदि सच में ही प्रेम है, तो वह घृणा कैसे बन सकता है?-आचार्य रजनीश ओशो|
ऐसे तो सभी मरते हैं, लेकिन धन्यभागी है वह, जो बोधपूर्वक मरता है, जो प्रेस से मरता है| देह तो मरेगी ही; लेकिन जो अहंकार को मर जाने देता है, उससे बड़ा सौभाग्यशाली व्यक्ति इस पृथ्वी पर दूसरा नहीं|-ओशो
आदर्शों के वस्त्रों में हम छिपा तो सकते हैं, लेकिन मिटा नहीं सकते| छिपाना मिटाने का उपाय नहीं है|-ओशा
जो हम नहीं हैं, वह हम अपने को मानते हैं और जो हम हैं, वह हम अपने को जानना भी नहीं चाहते हैं, मानने की बात दूर| हम उस तरफ आँख भी नहीं उठाना चाहते हैं|-ओशो
प्रेम किसी को नहीं जानता! : प्रेम न तो जाति को जानता है, न कुल को जानता है, न कुलीनता को जानता है, न धन को जानता| प्रेम का धन से क्या सम्बन्ध है? प्रेम न रंग को जानता है| हड्डी-मांस-मज्जा से प्रेम का सम्बन्ध क्या है? तुम हिन्दू हो कि मुसलमान कि जैन कि ईसाई, प्रेम का लेना-देना क्या है?-आचार्य रजनीश ओशो
आदमी पशु है! हम एक-एक आदमी को समझा रहे हैं कि तुम स्वयं परमात्मा हो| सच्चाई यह है कि हर आदमी परमात्मा नहीं है, सिर्फ पशु है| आदमी पशु है, यह तथ्य है, आदमी परमात्मा हो सकता है, यह संभावना है| लेकिन हम समझा रहे हैं आदमी परमात्मा है| साधु-सन्यासियों के पास पापी बैठकर सिर हिला रहे हैं और कहते हैं, धन्य महाराज, बहुत ठीक आप कह रहे हैं| क्योंकि वे साधु सन्यासी समझाते क्या हैं? वे समझाते हैं, तुम परमात्मा हो! तुम्हारे भीतर स्वयं सच्चिदानंद ब्रह्म का निवास है, तुम वही हो| और पापी बड़ा प्रसन्न होता है| अपने को भूलने में सुविधा मिल जाती है| वह जो है, उससे बचने का रास्ता मिल जाता है| सपने में वह ब्रह्म हो जाता है और वस्तुत: वह पशु बना रहता है और उसके पशु होने और ब्रह्म होने में एक दीवार खड़ी हो जाती है| होता है पशु, उसे छिपा लेता है| जो नहीं होता, उसका अभिनय करने लगता है| और इस तरह भारत का पूरा व्यक्तित्व स्प्लिट पर्सनैलिटी है, पूरा व्यक्तित्व खंड-खंड हो गया| दो बड़े खंडों में टूट गया-जो हम नहीं हैं, वह हम अपने को मानते हैं और जो हम हैं, वह हम अपने को जानना भी नहीं चाहते हैं, मानने की तो बात ही दूर है| हम उस तरफ आंख भी नहीं उठाना चाहते हैं| बड़ी तरकीब है यह| आदमी पशु है, यह भारत में आज तक स्वीकृत नहीं हो सका| और आदमी पशु है| पशुओं की बड़ी जमात का ही एक हिस्सा है| और जब तक हम आदमी की इस पशुता के तथ्य को, यह रियलिटी है, यथार्थ है, इसको स्वीकार नहीं करते, तब तक इसके रूपान्तरण को भी कोई मार्ग नहीं मिल सकता है|-आचार्य ओशो|
विश्रांत व्यक्ति भयभीत नहीं हो सकता है| तुम एक विश्रांत व्यक्ति को भयभीत नहीं कर सकते| यदि भय आता भी है, वह लहर की तरह आता है...वह जड़ें नहीं जमाएगा|
भय लहरों की तरह आता है और जाता है और तुम उससे अछूते बनते रहते हो, यह सुंदर है| जब वह तुम्हारे भीतर जड़ें जमा लेता है और तुम्हारे भीतर विकसित होने लगता है, तब यह फोड़ा बन जाता है, कैंसर का फोड़ा| तब वह तुम्हारे अंतस की बनावट को अपाहिज कर देता है|
तो जब कभी तुम आतंकित महसूस करो, एक चीज देखने की होती है कि शरीर तनावग्रस्त नहीं होना चाहिए| जमीन पर लेट जाओ और विश्रांत होओ, विश्रांत होना भय की विनाशक औषधि है; और वह आएगा और चला जाएगा| तुम बस देखते हो|
देखने में पसंद या नापंसद नहीं होनी चाहिए| तुम बस स्वीकारते हो कि यह ठीक है| दिन गरम है; तुम क्या कर सकते हो? शरीर से पसीना छूट रहा है...तुम्हें इससे गुजरना है| शाम करीब आ रही है, और शीतल हवाएं बहनी शुरू हो जाएंगी...इसलिए बस देखो और विश्रांत होओ|-आचार्य आशो
हिंदुस्तान ने पॉंच हजार सालों से जमीन पर चलने लायक रास्ता नहीं बनाया, स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजे हैं| स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजने में पृथ्वी पर रास्ते बनाना भूल गए हैं| हमारी आँखें आकाश की तरफ अटक गयी हैं| और हमारे पैर तो मजबूरी से पृथ्वी पर ही चलेंगे| बीसवीं सदी में आकर हमको अचानक पता चला है कि हमारी आँखों और पैरों में विरोध हो गया है| आँखें आकाश से वापस जमीन की तरफ लौटी हैं तो हम देखते हैं, नीचे कोई रास्ता नहीं है| नीचे हमने कभी देखा नहीं|-आचार्य रजनीश ओशो|
ज्योतिषी : मैंन सुना है कि यूनान में एक बहुत बड़ा ज्योतिषी एक रात एक गढ्ढे में गिर गया| जोर से चिल्लाया तो बड़ी मुश्किल से पास की किसी किसान औरत ने उसे निकाला| जब उसे निकाला, तो उस ज्योतिषी ने कहा है कि मॉं, बहुत धन्यवाद| मैं एक बहुत बड़ा ज्योतिषी हूँ, तारों के संबंध में मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता| अगर तुझे तारों के संबंध में कुछ जानना हो तो मैं बिना फीस के तुझे बता दूँगा| मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है| उस बूढ़ी औरत ने कहा, बेटे तुम निश्चिंत रहो, मैं कभी न आऊँगी, क्योंकि जिसे अभी जमीन के गढ्ढे नहीं दिखायी पड़ते हैं, उसके आकाश के तारों के ज्ञान का भरोसा मैं कैसे करूँ?-आचार्य ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.12.12 & 16.12.12 के अंक से साभार!
विश्रांत व्यक्ति भयभीत नहीं हो सकता है| तुम एक विश्रांत व्यक्ति को भयभीत नहीं कर सकते| यदि भय आता भी है, वह लहर की तरह आता है...वह जड़ें नहीं जमाएगा|
भय लहरों की तरह आता है और जाता है और तुम उससे अछूते बनते रहते हो, यह सुंदर है| जब वह तुम्हारे भीतर जड़ें जमा लेता है और तुम्हारे भीतर विकसित होने लगता है, तब यह फोड़ा बन जाता है, कैंसर का फोड़ा| तब वह तुम्हारे अंतस की बनावट को अपाहिज कर देता है|
तो जब कभी तुम आतंकित महसूस करो, एक चीज देखने की होती है कि शरीर तनावग्रस्त नहीं होना चाहिए| जमीन पर लेट जाओ और विश्रांत होओ, विश्रांत होना भय की विनाशक औषधि है; और वह आएगा और चला जाएगा| तुम बस देखते हो|
देखने में पसंद या नापंसद नहीं होनी चाहिए| तुम बस स्वीकारते हो कि यह ठीक है| दिन गरम है; तुम क्या कर सकते हो? शरीर से पसीना छूट रहा है...तुम्हें इससे गुजरना है| शाम करीब आ रही है, और शीतल हवाएं बहनी शुरू हो जाएंगी...इसलिए बस देखो और विश्रांत होओ|-आचार्य आशो
हिंदुस्तान ने पॉंच हजार सालों से जमीन पर चलने लायक रास्ता नहीं बनाया, स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजे हैं| स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजने में पृथ्वी पर रास्ते बनाना भूल गए हैं| हमारी आँखें आकाश की तरफ अटक गयी हैं| और हमारे पैर तो मजबूरी से पृथ्वी पर ही चलेंगे| बीसवीं सदी में आकर हमको अचानक पता चला है कि हमारी आँखों और पैरों में विरोध हो गया है| आँखें आकाश से वापस जमीन की तरफ लौटी हैं तो हम देखते हैं, नीचे कोई रास्ता नहीं है| नीचे हमने कभी देखा नहीं|-आचार्य रजनीश ओशो|
ज्योतिषी : मैंन सुना है कि यूनान में एक बहुत बड़ा ज्योतिषी एक रात एक गढ्ढे में गिर गया| जोर से चिल्लाया तो बड़ी मुश्किल से पास की किसी किसान औरत ने उसे निकाला| जब उसे निकाला, तो उस ज्योतिषी ने कहा है कि मॉं, बहुत धन्यवाद| मैं एक बहुत बड़ा ज्योतिषी हूँ, तारों के संबंध में मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता| अगर तुझे तारों के संबंध में कुछ जानना हो तो मैं बिना फीस के तुझे बता दूँगा| मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है| उस बूढ़ी औरत ने कहा, बेटे तुम निश्चिंत रहो, मैं कभी न आऊँगी, क्योंकि जिसे अभी जमीन के गढ्ढे नहीं दिखायी पड़ते हैं, उसके आकाश के तारों के ज्ञान का भरोसा मैं कैसे करूँ?-आचार्य ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.12.12 & 16.12.12 के अंक से साभार!
Sunday, 11 November 2012
हम सभी अजनबी हैं-कोई भी किसी को नहीं जानता! ओशो वाणी : नवम्बर, 2012
प्रेम तुम्हें रिक्त करता है-ईर्ष्या से रिक्त, पागलपन से रिक्त, क्रोध से रिक्त, प्रतिस्पर्धात्मकता से रिक्त, तुम्हारे अहंकार और उसके सारे कचरे से रिक्त करता है| लेकिन प्रेम तुम्हें कई बातों से भरता है, जिनके बारे में अभी तुम अनजान हो, यह तुम्हें खुश्बू से भरता है, प्रकाश से भरता है, आनन्द से भरता है|-ओशो|
अवसाद से कैसे बचें? अपने अवसाद को जगह मत बनाने दो| जिस क्षण तुम महसूस करो कि कुछ बात अवसाद बन रही है, दमन बन रही है, तत्काल स्वयं को गीत में, नृत्य में, हंसी में अभिव्यकत करो|-ओशो|
भोजन : जब स्त्री तुम्हें प्रेम करती है, तो वह तुम्हारे लिये बहुत सतर्कता से भोजन तैयार करेगी और उस भोजन में आध्यात्मिक गुणवत्ता होगी| वैज्ञानिक तौर पर इसमें फर्क करना सम्भव नहीं है कि भोजन प्रेम से बनाया गया है या बेरुखी से, लेकिन इसमें आध्यात्मिक रूप से भेद है| जो भोजन बेरुखी से बनाया जाता है, वह पचने में लम्बा समय लेता है और जो भोजन क्रोध, नफरत एवं ईर्ष्या से बनाया जाता है, वह पहले से ही जहर हो गया होता है|-ओशो|
क्रोधित-कामुक-गुलाम : जब कभी तुम क्रोधित होते हो, जब कभी तुम कामुक होते हो, तब तुम अपने मालिक नहीं रहे, बल्कि तुम अपने आपके गुलाम हो जाते हो|-ओशो
आत्मीयता : सभी आत्मीयता से डरते हैं| यह बात और है कि इस बारे में तुम सचेत हो या नहीं| आत्मीयता का मतलब होता है कि किसी अजनबी के सामने स्वयं को पूरी तरह से उघाड़ना| हम सभी अजनबी हैं-कोई भी किसी को नहीं जानता| हम स्वयं के प्रति भी अजनबी हैं, क्योंकि हम नहीं जानते कि हम हैं कौन!-ओशो।
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 16.11.12 के अंक से साभार!
आत्मीयता : सभी आत्मीयता से डरते हैं| यह बात और है कि इस बारे में तुम सचेत हो या नहीं| आत्मीयता का मतलब होता है कि किसी अजनबी के सामने स्वयं को पूरी तरह से उघाड़ना| हम सभी अजनबी हैं-कोई भी किसी को नहीं जानता| हम स्वयं के प्रति भी अजनबी हैं, क्योंकि हम नहीं जानते कि हम हैं कौन!-ओशो।
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 16.11.12 के अंक से साभार!
Friday, 2 November 2012
प्रेम इतना सुन्दर है कि कुरूप चीज भी इसके भीतर छिप सकती है! ओशो वाणी : अक्टूबर, 2012
जागा हुआ प्रेम ही प्रार्थना : सोये रहने वाले के लिये जिस प्रकार केवल सुबह हो जाने से ही कुछ नहीं होता| उसी प्रकार प्रेम हो जाने से ही कुछ नहीं होता| प्रेम हो-होकर भी लोग चूक जाते हैं| मन्दिर के द्वार तक आ-आकर लोग मुड़ जाते हैं, चूक जाते हैं| सीढियॉं चढ-चढकर लौट जाते हैं| प्रेम तो जीवन में बहुत बार घटता है, मगर बहुत थोड़े ही धन्यभागी होते हैं, जो जागते हैं| जो जाग जाते हैं, उनके प्रेम का नाम प्रार्थना है| जागे हुए प्रेम का नाम प्रार्थना है| जबकि सोई हुई प्रार्थना का नाम प्रेम है|-आशो|
तुम्हें एक बात हमेशा याद रखनी चाहिये कि जो लोग तुम्हारे साथ कार्य करते हैं, उन्हें तुम्हारे भीतर के जीवन से कुछ लेना-देना नहीं है| उससे निपटना तुम्हारा काम है; उनका अपना भीतर का जीवन है, जिसे उन्हें देखना है| उनके अपने नकारात्मक भाव हैं, उनकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं हैं| लेकिन जब तुम किसी के साथ कार्य कर रहे हो तो तुम्हें इसे बीच में नहीं लाना चाहिये, क्योंकि यदि वे अपनी सारी नकारात्मकता लाने लगे और तुम अपनी सारी नकारात्मकता लाने लगे, तो यह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया हो जायेगी| तुम्हें बस जरा इसे देखने की जरूरत है|-ओशो|
जीवन तर्क नहीं है| जीवन प्रेम है| तर्क जटिल घटना है| प्रेम सरल है, प्रेम निर्दोष संवाद है| प्रेम जीवन के संगीत के अधिक करीब है, बजाय गणित के, क्योंकि गणित मन का है और जीवन तुम्हारें हृदय की धड़कनों में धड़कता है|-ओशो
वह सब जो तुम कर रहे हो, यदि उसमें प्रेम नहीं है तो सब झूठा और बकवास है| लेकिन वह सब जो प्रेममय है, वह सब सत्य है| प्रेम की राह पर तुम जो कुछ करते हो वह तुम्हारी चेतना को विकसित करता है| तुम्हें अधिक सत्य देता है और अधिक सत्य बनाता है| हर चीज प्रेम के पीछे छिपी हुई होती है, क्योंकि प्रेम हर चीज की सुरक्षा कर सकता है| प्रेम इतना सुन्दर है कि कुरूप चीज भी इसके भीतर छिप सकती है और सुन्दर होने का ढोंग कर सकती है|-आचार्य रजनीश ओशो|
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के 01.10.12 के अंक से साभार!
Sunday, 30 September 2012
जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है! ओशो वाणी सितम्बर, 2012
आत्मीयता का मतलब होता है कि किसी अजनबी के सामने स्वंय को पूरी तरह से उघाड़ देना!
जानवर भी जानते हैं कि प्रेम कैसे करना है, लेकिन आदमी को सीखना पड़ता है!
प्रेम करना और प्रेम चाहना, ये बड़ी अलग बातें हैं| प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है| छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं| मॉं उनको प्रेम देती है| फिर वे बड़े होते हैं| वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं, परिवार उनको प्रेम देता है| फिर वे और बड़े होते हैं| अगर वे पति हुए, तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं| और जो भी प्रेम चाहता है, वह दुख झेलता है| क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता, प्रेम केवल किया जाता है| चाहने में पक्का नहीं है, मिलेगा या नहीं मिलेगा| और जिससे तुम चाह रहे हो, वह भी तुमसे चाहेगा| तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी| दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे| दुनिया में जितना पति-पत्नियों का संघर्ष है, उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है|
अगर पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें, तो जीवन स्वर्ग बन सकता है| और जितना वे प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे, उतना ही--अदभुत जगत की व्यवस्था है--उन्हें प्रेम मिलेगा| और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे--जितना वे प्रेम देंगे, उतना ही सेक्स उनका विलीन होता चला जाएगा|
सब लोग प्यार खोज रहे हैं और वह किसी को नहीं मिल रहा| प्यार के लिये दिलों में जो एक जुम्बिश चाहिये और अपने ‘मैं’ को लुटाने को जो अहसास चाहिये, वह तो कहीं है नहीं, फिर प्यार किसे और कैसे मिलेगा|
प्रेम का दुख हार्दिक है| कांटा हृदय में चुभता है, भूख हृदय में अनुभव होती है| उदासी, विषाद हृदय के केन्द्र में उमग्रता है| प्रेम का दुख आत्मिक है| और निश्चित ही जो आत्मिक दुख उठाने को तैयार है, उसने कीमत चुकाई, अपने जीवन को यज्ञ बनाया| जो जीवन को यज्ञ बना लेते हैं, वे ही पहुंचते हैं|-ओशो
आदर्शवाद का अर्थ होता है-जो है, वह महत्वूपर्ण नहीं है, जो होना चाहिये, वह महत्वपूर्ण है| और जो है, वही वस्तुत: महत्वूपर्ण है, जो होना चाहिये उसका कोई भी मूल्य नहीं है, क्योंकि वह नहीं है| बीज वृक्ष हो सकता है, लेकिन बीज वृक्ष है नहीं| बीज है बीज-वृक्ष होने की मात्र सम्भावना है| सम्भावना हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है|-ओशो
तुम्हें जब भी कुछ चुभता है, तब तुम समझते हो कोई तुम्हें चुभा रहा है, तुम भूल में हो| जब भी तुम्हें कुछ चुभता है, उसका अर्थ है कि तुम कांटे देखने में इतने कुशल हो गये हो कि हर चीज कांटा हो गयी है और हर चीज चुभती है|-ओशो
तुम सोचते हो तुमने बड़ा भारी काम किया, कोई शहीद हो गए! सोच रहे होओगे कि शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले| क्या विचार कर रहे हो? यह भी कोई प्रेम हुआ जो एक पर चुक गया? बूंद-बूंद रहा होगा, एकाध ही बूंद रहा होगा कि टपका कि खतम! फिर झरना ही सूख गया? इतना विराट संसार! प्रभु इतने रूपों में प्रकट! और तुम एक रूप में ही ऐसे भटक गये कि फिर तुम किसी और को प्रेम न कर पाये! तुम सोचते होओगे कि इतना बड़ा मैंने प्रेम किया, कि देखो, वह तो नहीं मिली, लेकिन मैं अब भी उसी का हूँ! फिर किसी को प्रेम नहीं किया!-ओशो
प्रेम की तीन सीढियॉं हैं-साधारण प्रेम: जो मित्र-मित्र, पति-पत्नी, मॉं-बेटे, भाई-भाई में होता है| असाधारण प्रेम: शिष्य और गुरु में होता| तीसरा : आत्मा और परमात्मा में, बूंद और सागर में होता है|-ओशो
जो भी समाज आदर्शवादी होगा, वह समाज सड़ जायेगा, वह समाज विकसित नहीं हो सकता| यथार्थवादी समाज होना चाहिये| प्रतिभा का विकास यथार्थवाद के मार्ग से होता है, आदर्शवाद के मार्ग से नहीं होता|-ओशो
जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है| प्रेम और घृणा कैसे बन सकता है?-ओशो
प्रेम और ध्यान : प्रेम का मतलब होता है-‘दूसरों के साथ होने की कला|’ जबकि ध्यान का मतलब है-‘स्वयं के साथ होने की कला|’-ओशो
विज्ञान जब तक प्रयोग में न लाया जाये तब तक व्यर्थ है| ज्ञान जब जीवन में उतरता है, तभी विज्ञान बनता है| विज्ञान याने विशेष ज्ञान|-ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के सितम्बर के अंकों से साभार!
तुम सोचते हो तुमने बड़ा भारी काम किया, कोई शहीद हो गए! सोच रहे होओगे कि शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले| क्या विचार कर रहे हो? यह भी कोई प्रेम हुआ जो एक पर चुक गया? बूंद-बूंद रहा होगा, एकाध ही बूंद रहा होगा कि टपका कि खतम! फिर झरना ही सूख गया? इतना विराट संसार! प्रभु इतने रूपों में प्रकट! और तुम एक रूप में ही ऐसे भटक गये कि फिर तुम किसी और को प्रेम न कर पाये! तुम सोचते होओगे कि इतना बड़ा मैंने प्रेम किया, कि देखो, वह तो नहीं मिली, लेकिन मैं अब भी उसी का हूँ! फिर किसी को प्रेम नहीं किया!-ओशो
प्रेम की तीन सीढियॉं हैं-साधारण प्रेम: जो मित्र-मित्र, पति-पत्नी, मॉं-बेटे, भाई-भाई में होता है| असाधारण प्रेम: शिष्य और गुरु में होता| तीसरा : आत्मा और परमात्मा में, बूंद और सागर में होता है|-ओशो
जो भी समाज आदर्शवादी होगा, वह समाज सड़ जायेगा, वह समाज विकसित नहीं हो सकता| यथार्थवादी समाज होना चाहिये| प्रतिभा का विकास यथार्थवाद के मार्ग से होता है, आदर्शवाद के मार्ग से नहीं होता|-ओशो
जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है| प्रेम और घृणा कैसे बन सकता है?-ओशो
प्रेम और ध्यान : प्रेम का मतलब होता है-‘दूसरों के साथ होने की कला|’ जबकि ध्यान का मतलब है-‘स्वयं के साथ होने की कला|’-ओशो
विज्ञान जब तक प्रयोग में न लाया जाये तब तक व्यर्थ है| ज्ञान जब जीवन में उतरता है, तभी विज्ञान बनता है| विज्ञान याने विशेष ज्ञान|-ओशो
स्त्रोत : जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका " के सितम्बर के अंकों से साभार!
Subscribe to:
Posts (Atom)
